लोकतंत्र का सम्मान करें, संविधान का आदर करें और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दें!
-:पुष्पारत्न प्रसाद पारखी:-

मुंबई श्रीकेश चौबे:-
भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक है। हमारे देश को एक सशक्त संविधान प्राप्त है। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने और शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार दिया है। लेकिन इन अधिकारों के साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी आती हैं। अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करते समय दूसरों के अधिकारों और देश में सामाजिक सद्भाव का सम्मान करना आवश्यक है।
लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर मर्यादाएँ लाँघना, आम जनता को परेशान करना और सार्वजनिक शांति भंग करना लोकतंत्र का उद्देश्य नहीं है।
विद्यार्थियों के आंदोलन से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग तक!
सीजेपी अर्थात् ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की ओर से विद्यार्थियों के मुद्दों को लेकर आंदोलन किया गया था। यदि विद्यार्थियों की शिक्षा, करियर और भविष्य का सवाल है, तो उनकी न्यायसंगत माँगों के लिए आवाज उठाना समझ में आता है।
लेकिन अब यही आंदोलन करने वाले लोग मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार के विरोध में आंदोलन करके उनके इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। ऐसे में इस आंदोलन की दिशा, इसके पीछे के कारणों और इससे आखिर हासिल क्या करना है, इस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विद्यार्थियों के मुद्दों का समर्थन करना और उन मुद्दों का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करना, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। विद्यार्थियों की न्यायसंगत माँगों का समर्थन होना चाहिए, लेकिन यदि उनके आंदोलन का इस्तेमाल व्यापक राजनीतिक संघर्ष के लिए किया जा रहा है, तो उसका निष्पक्ष मूल्यांकन भी होना चाहिए।
प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं के बारे में बयान देते समय मर्यादा नहीं रखनी चाहिए क्या?
आज एक और महत्वपूर्ण मुद्दा सामने आता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, भारतीय जनता पार्टी और अन्य राजनीतिक नेताओं के बारे में कुछ आंदोलनकारियों द्वारा दिए जा रहे बयानों पर आपत्तियाँ उठाई जा रही हैं।
लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की आलोचना करने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है। भारतीय जनता पार्टी की नीतियों से असहमति व्यक्त करने का भी अधिकार है। कोई भी नेता आलोचना से परे नहीं है।
लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच अंतर होता है।
सरकार की नीतियों पर सवाल उठाइए, निर्णयों की कमियाँ बताइए, प्रमाणों के आधार पर आरोप लगाइए और वैचारिक विरोध मजबूती से रखिए। लेकिन बयान देते समय सभ्य भाषा, तथ्यों और सार्वजनिक जिम्मेदारी का ध्यान रखना आवश्यक है।
किसी नेता से राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन मतभेदों को व्यक्तिगत अपमान का रूप नहीं देना चाहिए। प्रधानमंत्री हों, विपक्ष के नेता हों या किसी अन्य सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति हों, सभी के बारे में चर्चा करते समय तथ्यों और शालीनता की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
विद्यार्थियों का देश की राजनीति में रुचि लेना, सवाल पूछना और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना स्वागतयोग्य है। लेकिन किसी भी राजनीतिक विषय पर अपनी राय बनाते समय जानकारी की पुष्टि करना, स्वतंत्र रूप से विचार करना और जिम्मेदारी के साथ बयान देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
विचारों का जवाब विचारों से दीजिए; अपमान को राजनीतिक संघर्ष का हथियार मत बनाइए!
एसआईआर प्रक्रिया का विरोध आखिर किसलिए?
एसआईआर (Special Intensive Revision) अर्थात् मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण।
निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची का सटीक और अद्यतन होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। मृत व्यक्तियों के नामों से संबंधित प्रविष्टियों का नियमानुसार निपटारा करना, पात्रता की जाँच करना और मतदाता सूची की त्रुटियों को सुधारना इस प्रक्रिया का हिस्सा है।
लेकिन इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से न हटाया जाए, प्रत्येक पात्र मतदाता अपने मतदान के अधिकार का उपयोग कर सके और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिले।
यदि विपक्ष को एसआईआर प्रक्रिया पर आपत्तियाँ हैं, तो उन्हें प्रमाणों के आधार पर और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए। इसी तरह, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने वालों की बातों की भी निष्पक्षता से जाँच होनी चाहिए।
बिना प्रमाणों के यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि विपक्ष का उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वार्थ है। लेकिन चुनाव प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता को लेकर होने वाली चर्चा में तथ्यों को महत्व दिया जाना चाहिए।
आंदोलन के नाम पर आम जनता को परेशान क्यों किया जाए?
हर मुद्दे पर सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना, यातायात रोकना, आम नागरिकों को परेशान करना या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करता है।
अन्याय के खिलाफ आंदोलन करना लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन आंदोलन शांतिपूर्ण, जिम्मेदार और कानून के दायरे में होना चाहिए।
मतभेद हैं, तो संवाद कीजिए। शिकायतें हैं, तो प्रमाणों के साथ अपनी बात रखिए। अन्याय हुआ है, तो न्याय पाने के लिए कानूनी रास्ते अपनाइए। हर समस्या का समाधान हंगामे और संघर्ष में ही खोजने की आवश्यकता नहीं है
इतिहास से सबक लें!
भारत के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब आंतरिक मतभेदों और एकजुटता की कमी का लाभ विदेशी शक्तियों ने उठाया। इसलिए आज के समय में हमें अधिक सजग, एकजुट और जिम्मेदार रहने की आवश्यकता है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार के हर निर्णय का समर्थन किया जाए। यदि सरकार गलत है, तो उसकी आलोचना होनी ही चाहिए। विपक्ष को सवाल पूछने चाहिए और अन्याय के खिलाफ आवाज उठनी ही चाहिए।
लेकिन यह विरोध तथ्यों पर आधारित होना चाहिए। राजनीतिक मतभेदों के कारण समाज में नफरत पैदा नहीं होनी चाहिए और देश की एकता को नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए। इसका ध्यान रखना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
राष्ट्रहित सर्वोपरि!
आज आवश्यकता केवल विरोध करने की नहीं, बल्कि उचित विकल्प सुझाने, संवाद स्थापित करने और समस्याओं के समाधान के लिए मिलकर काम करने की है।
देश किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। यह सत्तापक्ष, विपक्ष और प्रत्येक भारतीय का है। देश की शांति, एकता, लोकतंत्र और प्रगति हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
राजनीतिक विरोध कीजिए, लेकिन शालीनता की मर्यादा मत छोड़िए। सरकार से सवाल पूछिए, लेकिन तथ्यों का आधार मत छोड़िए। आंदोलन कीजिए, लेकिन आम जनता को परेशान मत कीजिए। और सबसे महत्वपूर्ण बात, राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रहित को मत भूलिए!
आइए, लोकतंत्र की रक्षा करें! संविधान का सम्मान करें! पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करें! राजनीतिक मतभेदों का सम्मान करें और भारत की एकता एवं अखंडता को और अधिक मजबूत बनाएँ!
