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टीएमयू में सफल ट्रांसप्लांट, डेंटल डॉक्टर्स ने खराब दाढ़ हटाई, नई अक्ल दाढ़ लगाई

टीएमयू में सफल ट्रांसप्लांट, डेंटल डॉक्टर्स
ने खराब दाढ़ हटाई, नई अक्ल दाढ़ लगाई


तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर के कंजर्वेटिव डेंटिस्ट्री एंड एंडोडॉन्टिक्स विभाग के विशेषज्ञों ने पेश किया आधुनिक डेंटिस्ट्री का उत्कृष्ट उदाहरण

ख़ास बातें
डेंटल इम्प्लांट का किफायती और जैविक विकल्प- ऑटो- ट्रांसप्लांटेशन तकनीक
छह महीने के फॉलो-अप में पाया, ट्रांसप्लांट किया दांत मसूड़ों और हड्डी के साथ पूरी तरह स्थिर
ट्रांसप्लांटेशन विभाग के प्रो. रोहित कुमार शर्मा के मार्गदर्शन में सर्जिकल टीम के डॉ. अंजलि शर्मा, डॉ. साक्षी गर्ग और डॉ. हर्षित सेठी जैन रहे शामिल

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर के कंजर्वेटिव डेंटिस्ट्री एंड एंडोडॉन्टिक्स विभाग के विशेषज्ञों ने आधुनिक डेंटिस्ट्री का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया है। डॉक्टरों की टीम ने एक 30 वर्षीय महिला मरीज की खराब हो चुकी पहली दाढ़ की जगह उसकी अपनी ही तीसरी दाढ़- अक्ल दाढ़ को सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट किया। इस प्रक्रिया को ऑटो-ट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है, जिसमें कृत्रिम इम्प्लांट के बजाए मरीज के अपने ही प्राकृतिक दांत का इस्तेमाल होता है। 30 वर्षीय महिला परवीना बेगम के दाईं तरफ की पहली दाढ़ में चबाने की गंभीर समस्या लेकर विभाग में आई थी। जांच और डेंटल एक्स-रे में पाया, पहली दाढ़ अत्यधिक सड़ चुकी है, जिसे बचाना संभव नहीं था। गहन परीक्षण के बाद डॉक्टरों ने पाया कि मरीज की अक्ल दाढ़ डोनर के रूप में बिल्कुल उपयुक्त है। मरीज और परिजनों की सहमति के बाद सर्जरी की रूपरेखा तैयार की गई। डेंटल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. प्रदीप तांगड़े और वाइस प्रिंसिपल डॉ. अंकिता जैन ने इस सफल सर्जरी के लिए कंजर्वेटिव डेंटिस्ट्री एंड एंडोडॉन्टिक्स विभाग के एचओडी डॉ. नवीन छाबड़ा के संग-संग ट्रांसप्लांट करने वाली टीम को बधाई दी।

खराब दाढ़ को निकालने के बाद डॉक्टरों ने अक्ल दाढ़ को उसकी जड़ों के आसपास मौजूद पीरियोडॉन्टल लिगामेंट को सुरक्षित रखते हुए निकाला। इसके बाद दांत को पहली दाढ़ के खाली सॉकेट में बैठाकर टांकों और स्प्लिंट की मदद से स्थिर किया गया। डॉक्टरों के अनुसार स्वस्थ पीरियोडॉन्टल लिगामेंट ही दांत को नए स्थान पर मसूड़ों और हड्डी के साथ जुड़ने में मदद करता है। इस प्रक्रिया के बाद मरीज को नियमित जांच पर रखा गया। 6 महीने के फॉलो-अप में पाया, ट्रांसप्लांट किया गया दांत मसूड़ों और हड्डी के साथ पूरी तरह स्थिर, स्वस्थ और काम करने की स्थिति में है। डेंटल विशेषज्ञों के मुताबिक उपयुक्त मामलों में अक्ल दाढ़ का ऑटो-ट्रांसप्लांटेशन दांत बदलने का एक बेहद किफायती, जैविक और कम चीर-फाड़ वाला विकल्प है। इससे हड्डी और शरीर की प्राकृतिक संरचना बनी रहती है। यह सफल ट्रांसप्लांटेशन विभाग के प्रो. रोहित कुमार शर्मा के मार्गदर्शन में हुआ। सर्जिकल टीम में डॉ. अंजलि शर्मा, डॉ. साक्षी गर्ग और डॉ. हर्षित सेठी जैन शामिल रहे। डॉक्टरों ने बताया कि इस प्रक्रिया की सफलता डोनर दांत की बनावट, रिसिपिएंट साइट की स्थिति, सर्जिकल तकनीक और पीरियोडॉन्टल लिगामेंट के सही संरक्षण पर निर्भर करती है।

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