*भारतीय ज्ञान परंपरा का बनेगा विश्वकोश, वेदों से विज्ञान तक के स्रोत होंगे एक जगह संकलित

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन, दस्तावेजीकरण तथा शिक्षा एवं अनुसंधान में उसके समुचित समावेश पर विशेष बल दिया गया है। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए 14 अक्टूबर 2026 को भारतीय ज्ञान परंपरा विश्वकोश के निर्माण की दिशा में एक कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित प्राचीन ग्रंथों, पांडुलिपियों, ऐतिहासिक अभिलेखों तथा विभिन्न विषयों में उपलब्ध प्रमाणिक ज्ञान-स्रोतों की पहचान करना और उनका व्यवस्थित संकलन एवं दस्तावेजीकरण करना था, ताकि इन स्रोतों को आधुनिक शोध-पद्धतियों के माध्यम से विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों और आम पाठकों के लिए सुलभ बनाया जा सके।
इस कार्यशाला में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNNIT), इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा डी.ए.वी. कॉलेज सहित विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े विद्वानों एवं विषय-विशेषज्ञों ने सहभागिता की। कार्यशाला में बौद्ध धर्म, जैन धर्म, संस्कृत, पांडुलिपि अध्ययन, अरबी एवं फारसी, शरीर विज्ञान, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, शिक्षा, सिविल इंजीनियरिंग, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, मराठी, समाजशास्त्र और इतिहास जैसे विविध विषयों पर चर्चा की गई। विश्व आयुर्वेद मिशन के संस्थापक अध्यक्ष एवं आरोग्य भारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो.(डॉ) जी. एस. तोमर ने आयुर्वेद के क्षेत्र में विषय-प्रतिनिधि के रूप में सहभागिता की। विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की उपस्थिति ने भारतीय ज्ञान परंपरा के बहुआयामी स्वरूप को समझने और उसके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण के लिए अंतर्विषयक सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया।
प्रो. हरिकेश सिंह, पूर्व कुलपति, जय प्रकाश विश्वविद्यालय ने भारतीय शिक्षा पद्धति के महत्व, उसकी मूल दृष्टि और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय शिक्षा परंपरा के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए उसके मूल्यों, उद्देश्यों और व्यापक स्वरूप को समझने की आवश्यकता बताई। गोरखपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने भारतीय इतिहास के अध्ययन में मूल स्रोतों और प्रमाणों के महत्व को स्पष्ट किया तथा पाश्चात्य इतिहासकारों एवं ओरिएंटलिस्ट दृष्टिकोणों की सीमाओं और संभावित पूर्वाग्रहों को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने भारतीय इतिहास को भारतीय स्रोतों और प्रमाणों के आधार पर देखने तथा प्रस्तुत करने की महत्ता को रेखांकित किया।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. के. बी. पाण्डेय ने भारतीय ज्ञान परंपरा विश्वकोश निर्माण की पहल की सराहना की और इस दिशा में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने इस प्रयास को भारत की समृद्ध बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत के व्यवस्थित संकलन की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। प्रो. वी. के. निगम ने भारतीय ज्ञान परंपरा में अर्थशास्त्र से संबंधित स्रोतों और प्राचीन भारतीय आर्थिक चिंतन के महत्व पर चर्चा की। उन्होंने अर्थशास्त्र से संबंधित ग्रंथों एवं सामग्री को व्यवस्थित रूप से संकलित करने की आवश्यकता पर बल दिया। पांडुलिपि पुस्तकालय से जुड़े गुलाम सरवर ने पांडुलिपियों में उपलब्ध चित्रों, ऐतिहासिक संदर्भों और अन्य महत्वपूर्ण स्रोतों की उपलब्धता पर प्रकाश डाला।
संस्थान के निदेशक प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा विश्वकोश निर्माण की अवधारणा, उद्देश्य और भावी स्वरूप पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विश्वकोश का प्रथम भाग ग्रंथसूची के रूप में तैयार करने की योजना है। इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्रोतों को एक स्थान पर संकलित किया जाएगा। इस ग्रंथसूची में वेद, पुराण, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक ग्रंथों के साथ-साथ जैन, बौद्ध तथा अन्य भारतीय ज्ञान परंपराओं से संबंधित ग्रंथों और स्रोतों को भी शामिल किया जाएगा। इन स्रोतों को वैज्ञानिक, व्यवस्थित और आधुनिक पद्धति से एक खंड में उपलब्ध कराने का उद्देश्य यह है कि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और विद्वानों को संबंधित सामग्री की खोज के लिए अलग-अलग स्थानों पर भटकना न पड़े। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन, अनुसंधान और आगे के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।
निदेशक महोदय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक पक्षों को प्रामाणिक ग्रंथों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और उपलब्ध प्रमाणों के माध्यम से समझा एवं प्रस्तुत किया जा सकता है। भारतीय परंपरा में कुछ ऐसे ज्ञान और अनुभव भी हैं, जिनका मूल्यांकन केवल वर्तमान वैज्ञानिक कसौटियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसलिए ऐसे विषयों का अध्ययन उनके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में प्रमाणिकता, आलोचनात्मक दृष्टिकोण और शोधपरक पद्धति का विशेष महत्व रहेगा।
कार्यशाला में विषयवार विशेषज्ञों के सहयोग से भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध क्षेत्रों के मूल स्रोतों की पहचान, संकलन और दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर चर्चा की गई। प्रतिभागियों ने पांडुलिपियों और दुर्लभ ग्रंथों के संरक्षण, भारतीय इतिहास एवं शिक्षा परंपरा के प्रमाण-आधारित अध्ययन तथा पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध-पद्धतियों के बीच संवाद स्थापित करने पर बल दिया। यह भी रेखांकित किया गया कि भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित प्रमाणिक सामग्री को व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराने से भविष्य में शोधार्थियों और शिक्षाविदों को महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।
समग्र रूप से, भारतीय ज्ञान परंपरा विश्वकोश निर्माण कार्यशाला भारतीय बौद्धिक विरासत के संरक्षण, संकलन और व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रही। विभिन्न विषयों के विद्वानों की सहभागिता ने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा का व्यापक दस्तावेजीकरण इतिहास, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, शिक्षा और पांडुलिपि अध्ययन सहित अनेक क्षेत्रों के संयुक्त प्रयास से ही संभव है। प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में विश्वकोश के प्रथम भाग को ग्रंथसूची के रूप में विकसित करने की प्रस्तावित योजना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के अनुरूप भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और अध्ययन को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ भविष्य के शोध एवं अनुसंधान के लिए एक उपयोगी संदर्भ-संसाधन विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
