Thursday, October 15Ujala LIve News
Shadow

*हमीदिया गर्ल्स डिग्री कॉलेज, प्रयागराज में प्रो. चंद्रा पंत स्मृति व्याख्यान का आयोजन

*हमीदिया गर्ल्स डिग्री कॉलेज, प्रयागराज में प्रो. चंद्रा पंत स्मृति व्याख्यान का आयोजन*

मध्यकालीन भारत में महिलाओं की स्थिति और अतीत से वर्तमान तक यात्रा एवं पर्यटन के ऐतिहासिक महत्त्व पर विद्वानों ने रखे विचार हमीदिया गर्ल्स डिग्री कॉलेज, प्रयागराज के मध्यकालीन इतिहास विभाग के तत्वावधान में महाविद्यालय के बेगम खुर्शीद ख्वाजा सभागार में प्रो. चंद्रा पंत स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश-विदेश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों एवं विद्वानों ने सहभागिता की। व्याख्यान के दौरान मध्यकालीन भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति, इतिहास के अध्ययन में लैंगिक दृष्टिकोण की प्रासंगिकता तथा अतीत से वर्तमान तक यात्रा एवं पर्यटन के बदलते स्वरूप पर अकादमिक विमर्श हुआ।

प्राचार्या नासेहा ने संबोधन में महाविद्यालय के इतिहास पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। उन्होंने शिक्षा, शोध और अकादमिक विमर्श के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस प्रकार के स्मृति व्याख्यान महान शिक्षाविदों के योगदान को स्मरण करने के साथ-साथ विद्यार्थियों में इतिहास, समाज और संस्कृति के प्रति व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम की संयोजिका एवं मध्यकालीन इतिहास विभाग की अस्सिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नुज़हत फा़तिमा ने व्याख्यान की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने प्रो. चंद्रा पंत स्मृति व्याख्यान की शैक्षणिक एवं बौद्धिक प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए ऐसे आयोजनों को ज्ञान के आदान-प्रदान और ऐतिहासिक समझ के विस्तार का महत्त्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने प्रो. चन्द्रा पंत के जीवन और उपलब्धियों का परिचय दिया। साथ ही कार्यक्रम में उपस्थित सभी सम्मानित अतिथि वक्ताओं का भी परिचय दिया
इस अवसर पर भारतीय रिज़र्व बैंक की पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉ. दीपाली पंत जोशी प्रो. चन्द्रा पन्त की पुत्री विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रही।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एन. आर. फ़ारूक़ी ने अपने संबोधन में प्रो. चंद्रा पंत के साथ बिताए आत्मीय स्मृतियों को साझा किया।प्रो. फ़ारूक़ी ने कहा कि एक अच्छे इतिहासकार के लिए अपने विषय का गहन ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही इतिहास के मूल स्रोतों को समझने के लिए उनकी भाषा का ज्ञान भी अनिवार्य है। उन्होंने इतिहास लेखन में निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता के महत्त्व पर बल देते हुए कहा कि इतिहासकार को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर तथ्यों का विश्लेषण करना चाहिए। इतिहासकार का दायित्व केवल उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों को दोहराना नहीं, बल्कि गहन अध्ययन एवं शोध के माध्यम से नए तथ्यों को प्रकाश में लाना भी है। अपने व्याख्यान में उन्होंने मुगल सम्राट अकबर के हरम की महिलाओं की हज यात्रा का ऐतिहासिक उल्लेख भी किया। उन्होंने इस यात्रा के दौरान महिलाओं के समक्ष आई विभिन्न कठिनाइयों और चुनौतियों का वर्णन करते हुए तत्कालीन सामाजिक एवं ऐतिहासिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के इतिहास एवं संस्कृति विभाग की पूर्व प्रोफेसर प्रो. सुनीता जैदी ने ‘मध्यकालीन भारत में लैंगिक स्थिति’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने इतिहास लेखन की समृद्ध परंपरा में इलाहाबाद के महत्त्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए प्रो. चंद्रा पंत के शैक्षणिक एवं शोधपरक अवदान पर प्रकाश डाला। सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान के विविध पक्षों पर विस्तार से चर्चा की। स्त्री लेखन की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने ताराबाई शिंदे, पंडिता रमाबाई तथा रुकय्या सखावत हुसैन जैसी लेखिकाओं के साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया। साथ ही मीराबाई, रानी दुर्गावती, नूरजहाँ और हाड़ी रानी जैसी ऐतिहासिक महिलाओं के जीवन, व्यक्तित्व तथा सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने मुगलकालीन समाज में महिलाओं की बहुआयामी भूमिका को स्पष्ट करते हुए चित्रकला, कृषि जीवन, चरखा-कताई, पर्यावरण संरक्षण तथा लघु व्यवसायों में उनकी सक्रिय भागीदारी और महत्त्वपूर्ण योगदान की चर्चा की। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इतिहास के समग्र अध्ययन के लिए महिलाओं के अनुभवों, श्रम, सृजनात्मकता तथा सामाजिक-आर्थिक योगदान को इतिहास लेखन में उचित स्थान दिया जाना आवश्यक है। साथ ही थर्ड जेंडर पर चर्चा करते हुए, मुगल स्थापत्यकला में उनके योगदान पर प्रकाश डाला
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि अमेरिका स्थित वर्जीनिया विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई साहित्य की प्रोफेसर प्रो. मेहर अफशां फारूकी ने अपने संबोधन में साहित्य, इतिहास और संस्कृति के पारस्परिक संबंधों पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने इन विषयों के अंतर्संबंधों के माध्यम से अतीत और समाज को समझने की अकादमिक संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
उन्होंने प्रो. चंद्रा पंत द्वारा नूरजहाँ पर किए गए शोधकार्य और इतिहास लेखन में उनके महत्त्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किए।

कार्यक्रम के दौरान डॉ. नुज़हत फातिमा असिस्टेंट प्रोफ़ेसर मध्य की पुस्तक ‘तारिख़-ए-हमीदिया : सुनहरी विरासत के पचास साल’ का विमोचन भी किया गया। इसके अतिरिक्त, निबंध लेखन एवं रिपोर्ट लेखन प्रतियोगिताओं के विजेता प्रतिभागियों को पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया। प्रो. सुनीता जैदी ने सभी विजेताओं को एक-एक हज़ार रुपये भी दिया

कार्यक्रम की अध्यक्षता जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के इतिहास एवं संस्कृति विभाग के पूर्व प्रोफेसर प्रो. एस. आई. ए. जैदी ने की। उन्होंने ‘अतीत से वर्तमान तक यात्रा एवं पर्यटन’ विषय पर अपना अध्यक्षीय व्याख्यान प्रस्तुत किया।
उन्होंने पर्यटन की ‘धारण क्षमता’ की अवधारणा को रेखांकित करते हुए पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की संख्या, उपलब्ध संसाधनों तथा ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण और उनका समुचित प्रबंधन पर्यटन के सतत विकास के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम का संचालन मध्यकालीन इतिहास विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तबस्सुम निगार ने किया और कार्यक्रम के अंत में संयोजिका डॉ. नुज़हत फातिमा ने सभी अतिथियों, महाविद्यालय की प्राचार्या, शिक्षकगण, शोधार्थियों, छात्र-छात्राओं तथा उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर राजीव जोशी, बारां फ़ारूक़ी, अन्य महाविद्यालयों के शिक्षकगण, शोधार्थी उपस्थित रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *