Thursday, October 15Ujala LIve News
Shadow

महिला दरोगा संध्या जायसवाल के खिलाफ एस सी एस टी एक्ट में एफआईआर का आदेश रद्द,

महिला दरोगा संध्या जायसवाल के खिलाफ एस सी एस टी एक्ट में एफआईआर का आदेश रद्द,

कोर्ट ने कहा लोक सेवक के खिलाफ एफआईआर से पहले कानून का पालन जरूरी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी की महिला दरोगा संध्या जायसवाल के खिलाफ एस सी एस टी एक्ट में एफआईआर दर्ज करने के स्पेशल जज के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि लोक सेवक के खिलाफ एफआईआर का आदेश देने से पहले की बी एन एस एस की धारा 175(3) व 175(4) का पालन जरूरी है, जिसे ट्रायल कोर्ट ने नहीं किया।
न्यायमूर्ति संतोष राय ने संध्या जायसवाल की अपील पर यह आदेश दिया।
अपीलार्थी की ओर से अधिवक्ता अजय त्रिपाठी, सूर्य प्रकाश पांडेय ने बहस की, जबकि विपक्षी की ओर से जय प्रकाश सिंह व एजीए राजेश कुमार शुक्ला उपस्थित रहे।
विपक्षी सुशीला देवी ग्राम दसनीपुर, थाना चोलापुर, वाराणसी ने धारा 173(4)बी एन एस एस के तहत स्पेशल जज एस सी एस टी एक्ट वाराणसी में प्रार्थना पत्र दिया था। आरोप लगाया कि 22.जुलाई.2026 को रात 2-3 बजे दरोगा संध्या जायसवाल दो अज्ञात पुलिसकर्मियों के साथ घर में घुसी, जातिसूचक गाली दी और बेटे रोहित कुमार गौतम को जबरन उठा ले गई और थाना चोलापुर में अवैध रूप से हिरासत में रखा। एफआईआर बाद में दोपहर 1.58 बजे दर्ज की गई, जबकि गिरफ्तारी 23.जुलाई 2026 रात 2 बजे दिखाई गई, यानी 24 घंटे से ज्यादा अवैध हिरासत में रखा। सुशीला देवी ने कॉल रिकॉर्डिंग व सी सी टी वी फुटेज का हवाला दिया और कहा कि अंजना कुमारी से पुरानी रंजिश के कारण उसके बेटे को फंसाया गया है।

इस पर स्पेशल जज ने 02सितंबथ 2026 को आदेश पारित कर कहा कि पुलिस रिकॉर्ड में गड़बड़ी है, रात में रोहित को ले जाना स्वीकार है लेकिन सुपुर्दगीनामा रिपोर्ट के साथ नहीं लगाया गया। वीडियो व ट्रांसक्रिप्ट से प्रथम दृष्टया जातिसूचक गाली व रात में उठाना प्रतीत होता है। इसलिए धारा 173(4) का प्रार्थना पत्र स्वीकार कर एस एच ओ चोलापुर को तत्काल एफआईआर दर्ज कर राजपत्रित अधिकारी से 15 दिन में निष्पक्ष जांच का आदेश दिया था।
दरोगा संध्या जायसवाल ने कहा कि वह थाना चोलापुर में दर्ज अपराध की विवेचक हैं, जिसमें रोहित आरोपी है और यह एफआईआर अंजना कुमारी की तहरीर पर दर्ज हुई है। रोहित को 22.जुलाई .2026 को सूचना पर पकड़ा गया और उसी दिन उसकी मां को सुपुर्दगीनामा पर सौंप दिया गया था, इसलिए 24 घंटे अवैध हिरासत का आरोप गलत है। वह सरकारी सेवक है और सरकारी कर्तव्य का पालन कर रही थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश गंभीर खामी व बिना दिमाग लगाए पारित किया गया है।

कोर्ट ने कहा कि लोक सेवक के खिलाफ शिकायत पर वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट लेना और लोक सेवक के पक्ष को सुनना अनिवार्य है।

इस केस में स्पेशल जज ने थाना प्रभारी से रिपोर्ट मंगाई थी और पुलिस ने विस्तृत रिपोर्ट दी थी, लेकिन उसका न्यायिक परीक्षण नहीं किया। रिकॉर्ड में 22.जुलाई 2026 का सुपुर्दगीनामा है, जिस पर सुशीला देवी के हस्ताक्षर व मोबाइल नंबर है, जिससे रोहित को उसी दिन सौंपना दर्शाया गया है। अगर जज को शक था तो मूल दस्तावेज मंगा सकते थे, उसे नजरअंदाज कर यांत्रिक रूप से एफआईआर का आदेश नहीं दिया जा सकता।

साथ ही सुशीला देवी, उसके पति भैयालाल व बेटे रोहित के खिलाफ पहले से ही केस दर्ज है, यह तथ्य भी विचारणीय था।

कोर्ट ने कहा कि धारा 175(3) के तीन अनिवार्य तत्व – (i) शपथ पत्र के साथ प्रार्थना पत्र पर विचार, (ii) जैसी जांच जरूरी समझे वैसी जांच, (iii) पुलिस अधिकारी के अभिकथन पर विचार का पालन नहीं हुआ और धारा 175(4) की सुरक्षा – वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट व लोक सेवक का पक्ष का भी पालन नहीं हुआ। यह केवल प्रक्रिया की अनियमितता नहीं, बल्कि क्षेत्राधिकार की खामी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *