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*बढ़वारी कला में आवास योजना पर उठे गंभीर सवाल, अपात्रों को पात्र बनाने का आरोप; जांच की निष्पक्षता पर भी सवालिया निशान

*बढ़वारी कला में आवास योजना पर उठे गंभीर सवाल, अपात्रों को पात्र बनाने का आरोप; जांच की निष्पक्षता पर भी सवालिया निशान*

*एक सौ चौंसठ आवासों की सूची में लगभग अड़तालीस पर आपत्ति, पक्की दीवारों से लेकर एक ही परिवार में कई लाभार्थियों तक के आरोप—जवाब देगा कौन?*

कोरांव, प्रयागराज। विकासखंड कोरांव की ग्राम पंचायत बढ़वारी कला में सरकारी आवास योजना के लाभार्थियों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। शिकायतकर्ता ने एक सौ चौंसठ आवासों की सूची में लगभग अड़तालीस मामलों में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया है। शिकायत में पात्रता, परिवार की वास्तविक स्थिति और पहले से बने पक्के मकानों जैसे बिंदुओं पर सवाल उठाए गए हैं। मामला केवल लाभार्थियों के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच की निष्पक्षता, सत्यापन की प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही से भी जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि कुछ ऐसे लोगों को भी पात्र मान लिया गया, जिनकी पात्रता पर सवाल उठाए गए थे। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो सरकारी आवास योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। हालांकि, आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अभिलेखों की जांच के बिना किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। नायब तहसीलदार डैया अशोक कुमार की जांच पर सवाल: शिकायतकर्ता के अनुसार, नायब तहसीलदार डैया अशोक कुमार ने मौके पर पहुंचकर जांच की और संबंधित मामलों में पात्रता को लेकर स्थिति स्पष्ट की। लेकिन अब सवाल यह है कि जांच किन अभिलेखों के आधार पर की गई? क्या प्रत्येक लाभार्थी के मकान की वास्तविक स्थिति देखी गई? क्या परिवार की आर्थिक स्थिति, अलग-अलग निवास और पात्रता के निर्धारित मानकों का मिलान किया गया? शिकायतकर्ता का आरोप है कि बिना उसकी मौजूदगी में निष्पक्ष तरीके से सभी बिंदुओं की पड़ताल किए ही क्लीन चिट दे दी गई। यदि ऐसा हुआ है, तो जांच की गुणवत्ता और निष्पक्षता की समीक्षा कौन करेगा? क्या जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी, ताकि आरोपों और निष्कर्षों के बीच का अंतर सामने आ सके? एक ही परिवार में कई आवास मिलने का आरोप: शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में सास-बहू तथा पिता-पुत्र दोनों को आवास का लाभ दिया गया, जबकि उनके एक ही स्थान पर रहने की बात कही जा रही है। यदि ऐसा है, तो क्या दोनों परिवारों की पात्रता अलग-अलग मानकों पर जांची गई? क्या उनके अलग आवास, अलग गृहस्थी और निवास के प्रमाणों का सत्यापन किया गया? केवल रिश्तेदारी के आधार पर किसी को अपात्र नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक ही परिवार में कई लाभार्थियों के मामले में नियमों के अनुरूप जांच होना आवश्यक है। इसी तरह, कुछ लाभार्थियों के यहां पहले से पक्की दीवारें बनी होने का दावा किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मौके की तस्वीरें, आवास की स्थिति और राजस्व अभिलेख जांच का हिस्सा बने? क्या सत्यापन रिपोर्ट में इन तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख है? प्रशासनिक जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में: जानकारी के अनुसार, सहायक चकबंदी अधिकारी कोरांव के दायित्व के साथ नायब तहसीलदार डैया का अतिरिक्त पद भी अशोक कुमार को सौंपा गया है। बताया जा रहा है कि कई गांवों में चकबंदी की प्रक्रिया पूरी करने के बाद उन्होंने हाल ही में इस अतिरिक्त दायित्व को संभाला है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बढ़वारी कला की जांच के लिए उन्हें किस आदेश के तहत नामित किया गया? क्या जांच के लिए पर्याप्त समय और आवश्यक अभिलेख उपलब्ध कराए गए? क्या उपजिलाधिकारी कोरांव ने जांच की गुणवत्ता की समीक्षा की? क्या तहसीलदार और जिलाधिकारी प्रयागराज को शिकायत में लगाए गए आरोपों की जानकारी है? यदि जांच में कोई कमी पाई जाती है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? सरकारी आवास योजना का उद्देश्य वास्तविक जरूरतमंदों को पक्का घर उपलब्ध कराना है। इसलिए लाभार्थियों की सूची में किसी भी प्रकार की अनियमितता का आरोप सामने आने पर संबंधित अधिकारियों को तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। क्या एक सौ चौंसठ आवासों की पूरी सूची का स्वतंत्र सत्यापन कराया जा सकता है? क्या कथित रूप से संदिग्ध अड़तालीस मामलों की अलग से जांच होगी? क्या ग्राम पंचायत स्तर पर चयन प्रक्रिया, पात्रता संबंधी अभिलेख और मौके की रिपोर्ट का मिलान किया जाएगा? क्या प्रधान परिवार को आवास दिए जाने के आरोप की भी नियमों के अनुसार जांच होगी? यदि सभी लाभार्थी पात्र हैं, तो प्रशासन दस्तावेजों के आधार पर संदेह दूर क्यों नहीं करता? और यदि किसी को नियमों के विरुद्ध लाभ दिया गया है, तो क्या उसका लाभ निरस्त कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाएगी? शिकायतकर्ता ने चेतावनी दी है कि यदि अपात्रों को आवास दिए जाने की बात जांच में सही पाई गई और उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो वह उच्चाधिकारियों के साथ-साथ न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होगा। अब निगाहें जिलाधिकारी प्रयागराज, उपजिलाधिकारी कोरांव, तहसील प्रशासन तथा संबंधित ग्रामीण विकास अधिकारियों पर हैं। जरूरत इस बात की है कि आरोपों को न तो बिना जांच सच मान लिया जाए और न ही बिना ठोस सत्यापन के खारिज किया जाए। निष्पक्ष जांच, अभिलेखों की पारदर्शिता और नियमों के अनुसार कार्रवाई ही तय करेगी कि बढ़वारी कला में आवास योजना के लाभार्थियों का चयन सही हुआ या कहीं सरकारी सहायता के वितरण में गंभीर चूक हुई।

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