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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जन्म जयंती ‘कवि-दिवस’ के रूप में मनाई गई

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जन्म जयंती ‘कवि-दिवस’ के रूप में मनाई गई

प्रयागराज.हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज के तत्वावधान में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जन्म जयंती दिनांक रविवार, 03 अगस्त 2025 को ‘कवि-दिवस’ के अवसर पर कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती जी की प्रतिमा तथा राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के चित्र पर माल्यापर्ण के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रारम्भ में सम्मानित कवियों का स्वागत शाॅल, पुष्पगुच्छ एवं प्रतीक चिह्न प्रदान कर एकेडेमी के सचिव डाॅ. अजीत कुमार सिंह एवं कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए एकेडेमी के सचिव डाॅ. अजीत कुमार सिंह ने कहा ‘हिन्द 87 में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर उनके जन्म दिवस 3 अगस्त को ‘कवि-दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। जिसके फलस्वरूप उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने 26 अप्रैल 1987 को राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की स्मृति में प्रतिवर्ष 3 अगस्त को कवि-दिवस के रूप में आयोजित किए जाने की घोषणा की और तभी से प्रतिवर्ष ‘कवि- दिवस’ का आयोजन एकेडेमी द्वारा किया जाने लगा। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि श्री विरेन्द्र आस्तिक (कानपुर) तथा संचालन डाॅ. श्लेष गौतम ने किया। कवि सम्मेलन में डाॅ. प्रकाश खेतान (प्रयागराज), डाॅ. विजयानंद (प्रयागराज), श्री शैलेन्द्र (प्रयागराज), डाॅ. रेखा शेखावत (नई दिल्ली), डाॅ0 विनम्रसेन सिंह (प्रयागराज), श्री जीतेन्द्र ‘जलज’ (प्रयागराज), श्री शिवम भगवती (प्रयागराज), श्री कुमार विकास (प्रयागराज) ने काव्य पाठ किया। कवि सम्मेलन में कवियो ने कविता के सभी रसों से सराबोर किया तथा समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हुए कविताएँ सुनायी गयीं। विशेषकर सामाजिक सरोकारों से रुबरु होते हुए रचनाकारों ने रचनाओं में विविध रंग उड़ेले जिनका रसास्वादन करके श्रोता भाव विभोर हो गये। समस्त कवियों का काव्य-पाठ साथ में संलग्न है –
*रचनाकारों की पंक्तियां*
ऐ सावन दिन रात तू, बरस चुका है खूब
अब विनती थम जा यहीं, लोग रहे हैं डूब
*डॉ. श्लेष गौतम*
बस कहने को ही ये सावन, समानी कर देता है,
एक तुम्हारा ना होना, सब, बेमानी कर देता है
*डॉ. श्लेष गौतम*
पानी के रंग मे घुले बूंदो के बान – चले
धूप कुछ ढीली हुई दिन भी कुछ भीग
लाल तावे सा भा सूरज रंग कुछ पीला हुआ
घिर गये बादल घनरे. खेतों में धान पले
*जितेंद्र जलज*
प्रेम का अधिकार माँगा,
तुमसे केवल प्यार मांगा,
लुट गए हैं इस जनम में,
इसलिए हर बार मांगा।
*शिवम् भगवती*
जिन्दगी के रास्ते पर जब शहर कर चलता जरूरी है,
लोग कहते हैं करो मत पर, अब तो डरना भी जरुरी है।
हैं बहुत नकली यहाँ रिश्ते, इस लिए ये याद रखना तुम,
हो कोई कितना भी नज़दीकी, पर उचित दूरी जरूरी है |
*डॉ० विनम्रसेन सिंह*
जिंदगी जैसे कोई थियेटर और अदने से किरदार हम हैं
सारी दुनिया हमें पढ़ रही है, इक अधूरे से अख़बार हम है
*कुमार विकास*
अपनी अनकही गीतों में गाती, दिनभर की थकान को
चंद लम्हों में भुलाती, घर की चक्की में पिसते-पिसते
खुद में ही रिसते रिसते, प्रेम की तिलांजलि
साड़ी तक साबन बिताती औरतें
*डॉ रेखा शेखावत, हरियाणा*
मकरन्द बना करती कविता, जय हिन्द बना करती निर्भय
वन्देमातरम हुआ करती कविता, भारत माता की जय
*डॉ विजयानंद*
अपनी बात चीत रामायन
अपने काम-धाम वृन्दावन
दो कौड़ी का लगा सभी कुछ
जब-जब रूठ गया अपना पन
हम तो खाली मंदिर भर है
ईश्वर पास चला आता है
हम जमीन पर ही रहते है
अरबर पास चला आता है,,
*वीरेंद्र आस्तिक कानपुर*
हो मैने आवाज दो थी
पर रोका नहीं था
तुम मुड़कर कर भी देखोगे
पर सोचा न था
*शैलेन्द्र*
पड़ गमे पांव में छाले पे छाले
भरी दोपहरी में
जमीन उम्र दौलत सब गवां दो
कचहरी में
*डॉ प्रकाश खेतान*
कार्यक्रम के अंत में एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह, संजय पुरुषार्थी, डॉ अनिल कुमार सिंह, वजीर खान, रघुनाथ द्विवेदी, मनोज गुप्ता, डॉ संजय कुमार सिंह, डॉ प्रतिमा सिंह, नजर इलाहाबादी, एम एस खान सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य आदि उपस्थित रहे।

 

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