महंगी LPG से बेफिक्र बंदरकोला गांव: 75% घरों में गोबर गैस से जलते चूल्हे

रिपोर्ट उमा शंकर मिश्रा
जबलपुर। देश में एलपीजी सिलेंडर की बढ़ती कीमतें और आपूर्ति को लेकर लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है। कई शहरों और गांवों में लोग सिलेंडर के लिए परेशान नजर आ रहे हैं। लेकिन जबलपुर से करीब 45 किलोमीटर दूर बरगी क्षेत्र का बंदरकोला गांव इस मामले में एक अलग मिसाल बनकर सामने आया है। यहां अधिकांश घरों की रसोई एलपीजी सिलेंडर से नहीं, बल्कि गोबर से बनने वाली बायोगैस से चल रही है।
करीब 400 घरों और लगभग ढाई हजार की आबादी वाले इस गांव में लगभग 75 प्रतिशत परिवारों ने अपने घरों में बायोगैस प्लांट स्थापित कर लिए हैं। घरों के पीछे बने इन प्लांटों में पशुओं के गोबर और पानी से गैस तैयार की जाती है, जो पाइपलाइन के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचती है। ग्रामीण इसी गैस से चाय-नाश्ता और भोजन तैयार करते हैं, जिससे उन्हें महंगे एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
गांव की हेमवती पटेल बताती हैं कि घर में बायोगैस प्लांट होने से खाना बनाने की सुविधा बढ़ गई है। जरूरत पड़ते ही गैस जलाकर आराम से भोजन तैयार किया जा सकता है और सिलेंडर खत्म होने की चिंता भी नहीं रहती। वहीं संगीता बाई का कहना है कि बायोगैस का उपयोग आसान और सस्ता है, इसलिए गांव की कई महिलाएं इसे अपनाकर रसोई का काम कर रही हैं।
किसान कृष्णा पटेल बताते हैं कि गोबर और पानी से बनने वाली यह गैस पूरी तरह प्राकृतिक है और इससे रसोई का काम आसानी से हो जाता है। उनका कहना है कि इससे खर्च भी कम होता है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता।
गांव में बायोगैस के उपयोग की शुरुआत वर्ष 2013 में पूर्व सरपंच अजय पटेल ने अपने घर से की थी। उन्होंने अपने घर के पीछे बायोगैस प्लांट बनवाकर गोबर से गैस तैयार करना शुरू किया। धीरे-धीरे इस प्रयोग की जानकारी पूरे गांव में फैल गई और कई परिवारों ने अपने घरों में ऐसे प्लांट लगवा लिए।
आज स्थिति यह है कि बंदरकोला गांव के अधिकांश घरों में गोबर गैस से चूल्हा जलता है। प्लांट से निकलने वाली स्लरी खेतों के लिए जैविक खाद का काम करती है, जिससे खेती को भी फायदा मिलता है। स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति जागरूकता के कारण यह गांव राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुका है और अब आसपास के गांवों के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रहा है।
