*ठाणे RTO ने दोहरे ऑटो परमिट मामले में वागले स्टेट पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई*
*विधायक नरेंद्र मेहता ने खोली थी दोहरे परमि में कांड की पोल*
*जून से अक्टूबर तक जनता दरबार में उठा मामला; IPC की धारा 177, 199, 200 और 420 के तहत FIR दर्ज होने का उल्लेख, नौ साल तक दोनों ऑटो चलने पर परिवहन विभाग की कार्यशैली पर उठा सवाल*
मुंबई श्रीकेश चौबे:- ठाणे प्रादेशिक परिवहन कार्यालय (RTO) ने कथित रूप से गलत जानकारी देकर दूसरा ऑटोरिक्शा परमिट प्राप्त करने के मामले में वागले एस्टेट पुलिस स्टेशन में 7 अक्टूबर 2026 को FIR क्रमांक 0410/2026 दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। वर्ष 2016 से जुड़े बताए जा रहे इस प्रकरण में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 177, 199, 200 और 420 का उल्लेख किया गया है। जून से अक्टूबर 2026 तक विधायक नरेंद्र मेहता द्वारा इस मुद्दे को बार बार उठाए जाने के बाद FIR दर्ज कराई गई,इस मामले में ठाणे एवं बोरीवली दोनों RTO कार्यालयों की कार्यशैली और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।पहला परमिट होने के बावजूद दूसरा परमिट लेने का गंभीर मामला उजागर हुआ है।
आरोपी महिला दो सहकारी संस्थाओं में पदाधिकारी है ?बावजूद इसके उन्हें 2 ऑटो रिक्शा परमिट किस अधिकारी की मेहरबानी से जारी हुआ यह जांच का विषय बन गया है?
श्रीमती शोभा संदीप तौर (हुलमुख) पद्मावती महिला औद्योगिक उत्पादक सहकारी संस्था मर्यादित की अध्यक्ष हैं, जो शासन की शालेय पोषण आहार योजना संचालित करती है। इसके अलावा, वे श्रद्धा को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी लिमिटेड, मुंबई में उपाध्यक्ष हैं।
अब उनके नाम पर कथित दोहरे ऑटो परमिट का मामला सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि परमिट जारी करते समय नियमों का पालन हुआ था या नहीं? संबंधित आरटीओ से दोनों परमिटों के दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट करने की मांग है। आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही होनी चाहिए।
शिकायतकर्ता के अनुसार, शोभा रामनाथ हुलमुख के नाम पर बोरीवली RTO से पहले परमिट होने के बावजूद ठाणे RTO से दूसरा ऑटोरिक्शा परमिट प्राप्त करने का आरोप है। आरोप है कि पहले परमिट की जानकारी छिपाकर कथित रूप से गलत घोषणा-पत्र या जानकारी के आधार पर दूसरा परमिट हासिल किया गया। इन आरोपों की सत्यता पुलिस जांच और संबंधित दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी।
विधायक नरेंद्र मेहता ने जनता दरबार में लगातार यह गंभीर मामला उठाया
शिकायतकर्ता का दावा है कि उन्होंने जून से अक्टूबर 2026 के बीच मीरा-भाईंदर के विधायक नरेंद्र मेहता के जनता दरबार में लगातार यह मामला उठाया। शिकायतकर्ता के अनुसार, विधायक ने संबंधित पुलिस और RTO अधिकारियों से संपर्क कर कार्रवाई के लिए प्रयास किए। शिकायतकर्ता ने ठाणे पुलिस परिमंडल-5 के उपायुक्त प्रशांत कदम, वागले एस्टेट पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक अशोक उत्तेकर और PSI किशन राठौड़ के सहयोग का भी उल्लेख किया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि इन प्रयासों के बाद 7 अक्टूबर 2026 को FIR दर्ज हुई।
नौ साल तक दोनों ऑटो सड़क पर कैसे चलते रहे?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दोनों ऑटोरिक्शा के परमिट, पासिंग और फिटनेस की प्रक्रिया होती रही, तो कथित दोहरे परमिट का मामला इतने वर्षों तक सामने क्यों नहीं आया?
शिकायतकर्ता के अनुसार, बोरीवली RTO और ठाणे RTO के रिकॉर्ड का मिलान कर यह जांच होनी चाहिए कि दोनों वाहनों के परमिट, पासिंग और फिटनेस दस्तावेजों का सत्यापन किस प्रकार किया गया। यदि रिकॉर्ड में विसंगतियां थीं, तो संबंधित अधिकारियों की नजर उन पर क्यों नहीं पड़ी? क्या दोनों RTO कार्यालयों के बीच आवश्यक जानकारी साझा की गई थी? इन सवालों के जवाब निष्पक्ष जांच से सामने आने चाहिए।
एजेंटों की कथित मिलीभगत पर भी कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने इस मामले में एजेंटों की संभावित भूमिका की भी जांच करने की मांग की है। परमिट के लिए आवेदन किसने तैयार किया, दस्तावेज किसने जमा किए, सत्यापन किस स्तर पर हुआ और किसी एजेंट ने कथित रूप से गलत जानकारी देने में सहायता की या नहीं—इन सभी पहलुओं की जांच जरूरी है। यदि किसी एजेंट या अन्य व्यक्ति की संलिप्तता प्रमाणित होती है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
शिकायतकर्ता को झूठे मामले में फंसाने की कथित धमकी का आरोप
शिकायतकर्ता का आरोप है कि कथित दोहरे परमिट के मामले में कार्रवाई की मांग करने के दौरान उन पर शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया और कथित रूप से झूठे मामले में फंसाने की धमकी भी दी गई। शिकायतकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज कराई गई FIR को भी कथित रूप से झूठा बताया है। उनका दावा है कि इस प्रकार के दबाव के बावजूद उन्होंने मामले को उठाना जारी रखा।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। शिकायतकर्ता के खिलाफ दर्ज FIR के तथ्यों, संबंधित शिकायतों और कथित धमकियों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किसी प्रकार का अनुचित दबाव बनाया गया था या नहीं।
पुलिस और RTO अधिकारियों को गुमराह किए जाने का आरोप
शिकायतकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या इस प्रकरण में पुलिस या RTO अधिकारियों को अधूरी अथवा भ्रामक जानकारी दी गई। जून से अक्टूबर 2026 के बीच हुए पत्राचार, पुलिस द्वारा मांगे गए रिकॉर्ड और RTO की ओर से दिए गए जवाबों की जांच कर कार्रवाई में हुई देरी के कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए।
IPC की धाराओं के तहत दर्ज मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी
इस प्रकरण में FIR के अनुसार IPC की धारा 177, 199, 200 और 420 का उल्लेख किया गया है। इन धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों, बयानों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर होनी चाहिए। दोनों RTO कार्यालयों के रिकॉर्ड, वाहन पासिंग एवं फिटनेस दस्तावेजों, परमिट आवेदनों, कथित एजेंटों की भूमिका और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली की भी जांच की जानी चाहिए।
फिलहाल, FIR दर्ज होना जांच की शुरुआत है, आरोपों का अंतिम प्रमाण नहीं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस जांच में कथित दोहरे परमिट, दोनों RTO कार्यालयों की भूमिका, एजेंटों की संभावित संलिप्तता और शिकायतकर्ता पर कथित दबाव के आरोपों को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं। यदि किसी व्यक्ति या अधिकारी की लापरवाही अथवा मिलीभगत प्रमाणित होती है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
