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उर्दू कविताओं में श्री कृष्ण भक्ति लेख …डॉ अजय मालवीय

उर्दू कविताओं में श्री कृष्ण भक्ति

लेख …डॉ अजय मालवीय

रामायण और महाभारत की भांति श्रीमद् भागवत गीता के भी अनुवाद उर्दू भाषा में प्रचुर मात्रा में हुए हैं। मेरे शोध के अनुसार अब तक लगगभग डेढ़ सौ अनुवाद उर्दू भाषा में हो चुके हैं। हिंदू रचनाकारों के साथ साथ मुस्लिम साहित्यकारों ने भी श्रीनमद् भागवत गीता का अनुवाद बड़ी कुशलता पूर्वक किया है। श्रीमद् भागवत गीता और प्रभु श्री कृष्ण जी की महिमा एवम् महत्ता का वर्णन श्रद्धा एवम् भक्ति से उर्दू कविताओं में प्रस्तुत करने वाले कवियों में विशेष रूप से नज़ीर अकबराबादी,भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मोहसिन काकोरवी, हसरत मोहानी, हफ़ीज़ जालंधरी, फ़िराक़ गोरखपुरी, ख़्वाजा दिल मोहम्मद, सागर निज़ामी, रईस पानीपती, सीमाब अकबराबादी, चंद्र भान कैफ़ी देहलवी, शान उल हक़ हक़ी निदा फाजिली, अनवर जलालपुरी, बिस्मिल इलाहाबादी और जाफर रज़ा इत्यादि ।
नज़ीर अकबराबादी को उर्दू भाषा में कविता का जन्मदाता कहा जाता है। नज़ीर पूर्णतः भारतीय कवि है जिसने भारत की धार्मिक एवम् सांस्कृतिक, और भारतीय जीवन शैली एवम् भारतीय दर्शन को अपनी उर्दू कविताओं में प्रमुखता से प्रस्तुत किया है। नज़ीर अकबराबादी भारत के धर्म एवम् संस्कृति के ध्वजवाहक हैं। भगवान श्री कृष्ण जी की भक्ति से ओतप्रोत उन्होंने प्रचुर मात्रा में कविताएँ लिखी हैं। जन्म कन्हैया जी, बालपन बांसुरी बजैया का, खेलकूद कन्हैया जी का, कन्हैया जी की रास और ब्याह कन्हैया जी का इत्यादि कविताओं में नज़ीर अकबराबादी की भगवान श्री कृष्ण जी से सच्ची भक्ति एवम् श्रद्धा देखी जा सकती है।
भगवान श्री कृष्ण जी के बचपन और रास लीलाओं की जीती जागती तस्वीर उन्होंने अपनी कविता बालपन बांसुरी बजैया का में बड़ी कुशलता और सफलता के साथ प्रस्तुत किया है। इस संदर्भ में उनकी कविता बालपन बांसुरी बजैया का से कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं:
उनको तो बालपन से न था कम कुछ ज़रा।
संसार की जो रीत थी उसको रखा बजा।।
मालिक थे वो तो आप ही उन्हें बालपन से क्या।
वाँ बालपन, जवानी,बुढ़ापा, सब एक था।।
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन।।
बाले हो बृजराज जो दुनिया में आ गए।
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गए।।
इस बालपन के रूप में कितनों को भा गए।
इक ये भी लहर थी कि जहाँ में को जता गए।।
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन।
क्या क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन।।
आधुनिक हिंदी गद्य के जन्मदाता पंडित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने लेखन का प्रारंभ उर्दू ग़ज़ल से किया। साहित्य अकादमी नई दिल्ली ने उनकी गजलों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है। उर्दू में उन्होंने रसा के नाम से ग़ज़लें लिखी हैं लेकिन तथाकथित मुस्लिम साहित्यकारों ने उनकी उत्कृष्ट ग़ज़लों को प्रोत्साहित नहीं किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने उर्दू दुनिया को छोड़कर हिंदी गद्य लेखन में अपना कार्य प्रारंभ किया और वर्तमान में वह आधुनिक हिंदी गद्य के जन्मदाता कहे जाते हैं। भगवान श्री कृष्ण से उनकी भक्ति एवम् श्रद्धा के रंग में रंगा हुआ यह दो पंक्तियां उद्धृत हैं:
जहाँ देखो वहाँ मौजूद मेरा कृष्ण प्यारा है।
उसी का सबसे जलवा जो जहाँ में आशकारा है।।
हसरत मोहानी भगवान श्री कृष्ण जी के व्यक्तित्व एवम् कृतित्व से प्रभावित दिखाई देते हैं। लीलाधारी प्रभु श्री कृष्ण के प्रेम रस में हसरत मोहानी सराबोर नज़र आते हैं। निम्नलिखित पंक्तियां उनकी सच्ची श्रद्धा एवम् भक्ति को प्रस्तुत करते हैं:
हसरत की भी क़बूल हो मथुरा में हाज़िरी।
सुनते हैं आशिक़ों पे तुम्हारा करम है आज।।
प्याम ए हयात जावेदाँ था ।
हर नग़मा कृष्ण बांसुरी का।।
सीमाब अकबराबादी को भगवान श्री कृष्ण से अगाध प्रेम था। उन्होंने अपनी कविता श्री कृष्ण में लीलाधारी श्री कृष्ण के व्यक्तित्व एवम् कृतित्व और उनके दार्शनिक सिद्धांतों को अपनी कविता में प्रस्तुत किया है। इस कविता में उन्होंने भगवान श्री कृष्ण जी को हिन्दुस्तान का पैगंबर स्वीकार किया है और उन्होंने इस कविता में विशेष रूप से इस बात पर बल प्रदान किया है कि भगवान श्री कृष्ण जी का मुख्य उद्देश्य समाज में प्रेम रस का संचार करना था। इस संदर्भ में उनकी दो पंक्तियां उद्धृत हैं:
दिलों में रंग मोहब्बत का उस्तवार किया।
स्वाद ए हिंद को गीता से नग़मा बार किया।।
फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी कविताओं में भगवान श्री कृष्ण की भक्ति एवम् श्रद्धा में गीत गाये हैं। कारागार में श्री कृष्ण जन्म के बाद वसुदेव जी का गोकुल में नंद जी के यहाँ काली रात में श्री कृष्ण को ले जाने की अद्भुत झांकी फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी कविता में प्रस्तुत की है।फ़िराक़ गोरखपुरी का कृष्ण की भक्ति एवम् श्रद्धा में डूबी हुई दो पंक्तियां उद्धृत हैं:
वो रातों रात श्री कृष्ण को उठाए हुए।
बला की क़ैद से वसुदेव का निकल जाना।।
फ़िराक़ गोरखपुरी ने राधा के अपार सौंदर्य को अपनी कविता का विषय बनाया है। प्रातःकाल राधा के सो कर उठने के मनोरम दृश्य को फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी रुबाई में बड़ी कुशलता पूर्वक प्रस्तुत किया है। जिसमें भारतीय नारी का सौंदर्य उभरकर हमारे सामने आता है।इस संदर्भ में उनकी दो रुबाइयां प्रस्तुत हैं:
जब पिछले पहर प्रेम की दुनिया सो ली।
कलियों की गिरह पहली किरन ने खोली।।
जोबन रस छलकाती उठी चंचल नार।
राधा गोकुल में जैसे खेले होली।।
मधुबन में बसंत सा सजीला है वो रूप।
बरखा की तरह रसीला है वो रूप।।
राधा की झपक कृष्ण की बरजोरी है।
गोकुल नगरी की रासलीला है वो रूप।।
रईस पानीपती ने भगवान श्री कृष्ण जी की भक्ति एवम् श्रद्धा से ओतप्रोत कविताऐं लिखी हैं। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम में प्रभु श्री कृष्ण के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित किए हैं। रईस पानीपती का श्री कृष्ण के भक्ति रस में डूबा हुआ एक छंद उद्धृत है:
एक प्रेम पुजारी आया है चरणों में ध्यान लगाने को।
भगवान तुम्हारी सूरत पर श्रद्धा के फूल चढ़ाने को।।
उपदेश धरम का देकर फिर बलवान बना दो भक्तों को।
ऐ मोहन जल्द ज़ुबाँ खोलो गीता का राज़ बताने को।।
चर्ख चिनौटी ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रभु श्री कृष्ण की महिमा का गुणगान उर्दू शाइरी में बड़ी निपुणता और सफलता के साथ किया है। ये दो पंक्तियां कवि की भगवान श्री कृष्ण की प्रेम, श्रद्धा एवम् भक्ति को उजागर करता है:
मेरी दुनिया संवार दी उसने।
मेरी रूहे रवाँ है मेरा कृष्ण।।
शाहनामा इस्लाम के रचयिता हफ़ीज़ जालंधरी ने भगवान श्री कृष्ण की महिमा के गीत बड़े आनबान और शान के साथ गाया है। भगवान श्री कृष्ण जी से हफ़ीज़ जालंधरी की सच्ची निष्ठा, प्रेम और भक्ति का अनूठा और अनमोल उदाहरण उनकी कविताओं में देखा जा सकता है। इस संदर्भ में हफ़ीज़ जालंधरी की कविता कृष्ण कन्हैया की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं:
ऐ देखने वालों
उस हुस्न को देखो
उस राज को समझो
यह पैकर ए तनवीर
यह कृष्ण की तस्वीर
माइनी है कि सूरत
सनअत है कि फ़ितरत
ज़ाहिर है कि मस्तूर
नज़दीक है कि दूर
यह नार है या नूर
दुनिया से निराला
यह बाँसुरी वाला
गोकुल का ग्वाला
है सहर कि एजाज़
क्या शान है वा अल्लाह
क्या आन है वा अल्लाह
साग़र निज़ामी की कविता पनघट की रानी में भगवान श्री कृष्ण की महिमा और भक्ति विशेष रूप से दिखाई पड़ती है। कवि ने अपने सारगर्भित विचारों की अभिव्यक्ति इस कविता में बड़ी कुशलता और सफलता के साथ प्रस्तुत किया है। राधा के पनघट पर जाने और श्री कृष्ण जी के मुरली के जादू की छवि को बड़ी ख़ूबसूरती के साथ वर्णित किया है। सागर निज़ामी की चर्चित कविता पनघट की रानी के कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं:
रग रग जिसकी है बाजा नस नस ज़ंजीर।
कृष्ण मुरारी की बंसी है या अर्जुन का तीर।।
सर से पा तक शोखी की वो इक रंगीं तस्वीर।
पनघट व्याकुल जिसकी ख़ातिर चंचल जमुना नीर।।
जिस का रास्ता टुक टुक देखे सूरज सा रहगीर ।
आई पनघट की देवी वो पनघट की रानी।।
उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित कवि मोहसिन काकोरवी भी प्रभु श्री कृष्ण जी के प्रति निष्ठा, भक्ति एवम् श्रद्धा में डूबे हुए नज़र आते हैं। उन्होंने अपनी कविता में श्री कृष्ण जी की महिमा और भक्ति के गीत बड़ी निपुणता और सफलता के साथ गाये हैं। भगवान श्री कृष्ण जी की महिमा का बखान करते हुए मोहसिन काकोरवी ने लिखा है:
सिम्त काशी से चला जानिबे मथुरा बादल।
तैरता है कभी गंगा कभी जमुना जल।।
देखिये होगा श्री कृष्ण का क्यों कर दर्शन।
सीना ए तंग में दिल गोपियों का है व्याकुल।।
सिम्त काशी से गया जानिबे मथुरा बादल।
बृज में आज श्री कृष्ण है काला बादल।।
खूब छाया है सर ए गोकुल व मथुरा बादल।
रंग में आज कन्हैया के है डूबा बादल।।
राजा इंद्र है परी खान ए मय का पानी।
नग़म ए मय का सर ए किशन कन्हैया बादल।।
सुखदेव प्रसाद सिन्हा बिस्मिल इलाहाबादी ने लीलाधारी श्री कृष्ण के व्यक्तित्व एवम् कृतित्व का वर्णन अपनी कविता श्री कृष्णा में बड़ी कुशलता एवम् सफलता पूर्वक प्रस्तुत किया है।20 अगस्त 1947 को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर बिस्मिल इलाहाबादी ने इस कविता को इलाहाबाद के एक कार्यक्रम में पढ़ी थी। उस कार्यक्रम की अध्यक्षता इलाहाबाद के तत्कालीन कमिश्नर कुँअर महराज सिंह ने किया था। बिस्मिल इलाहाबादी ने अपनी कविता श्री कृष्णा में अपने सारगर्भित विचारों और हृदय के उदगार को बड़ी ख़ूबसूरती के साथ व्यक्त किया है। बिस्मिल इलाहाबादी की कविता श्री कृष्णा की कुछ पंक्तियां उद्धृत हैं:
यह वो शब है जो नसीहत है ज़माने के लिए।
यह वो शब है जो इबादत है ज़माने के लिए।।
आज की रात सिया बख्त हमारा चकमा।
आज की रात उम्मीदों का सितारा चमका।।
लिया मथुरा में जनम जा के रहा गोकुल में।
पाँव के रखते ही अमृत मिला जमुना जल में।।
वो कन्हैया वो मेरे दिल को लुभाने वाला।
वो ज़माने में नए रूप से आने वाला।।
वो भजन नग़म ए इल्हाम बताने वाला।
वो बड़े प्रेम से बंसी को बजाने वाला।।
ज्ञान की राह ज़माने को दिखाई तूने।
प्रेम क्या चीज़ है ये बात बताई तूने।।
अपनी कूवत को बड़े जोश में लाने वाला।
उंगलियों पर वो गोवर्धन को उठाने वाला।।
वो सुदामा की ग़रीबी को मिटाने वाला।
काम संकट में हर इक शख़्स के आने वाला।।
कौरवों का वो गुरूर और निशाँ तक न बचा।
रण में सब क़त्ल हुए एक जवाँ तक न बचा।।
ग़ौर से देखें ज़रा लोग तमाशा क्या है।
तूने गीता में बताया है कि दुनिया क्या है।।
न हुआ है न कोई होगा तिरा सानी भी।
ऐसा योगी भी कहीं ऐसा कहीं ज्ञानी भी।।
निदा फ़ाज़ली भी लीलाधारी प्रभु श्री कृष्ण के व्यक्तित्व एवम् कृतित्व से प्रभावित दिखाई देते हैं। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की महिमा का गुणगान अपनी ग़ज़लों में किया है। भगवान श्री कृष्ण जी की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि:
वृंदावन के कृष्ण कन्हैया अल्लाह हू।
बंसी राधा गीता ज्ञान अल्लाह हू।।
जाफ़र रज़ा का मानना है कि राम और रहीम के दरमियान फ़र्क़ करना उचित नहीं है क्योंकि दोनों वास्तविक रूप से एक हैं। इसी विचार को उन्होंने अपने एक दोहे में वर्णित किया है। सभी लोग जानते हैं कि इस्लाम धर्म के मानने वाले लोग जब लेखन का कार्य प्रारंभ करते हैं तो सबसे ॐ के स्थान पर 786 लिखते हैं क्योंकि बिस्मिल्ला उल रहमान उल रहीम के सभी वर्णों का योग 786 होता है। जाफ़र रज़ा ने यह बताने का प्रयास किया है कि हरे कृष्ण के वर्णो के योग की संख्या भी 786 होती है। इस संदर्भ में उनका यह दोहा उद्धृत है:
सात सौ छियासी में राम और रहीम मिल जाएं।
बिस्मिल्लाह के वही आदाद हरे कृष्णा में आयें।।
जाफ़र रज़ा ने एक पंक्ति लिखा कि अब दिल में बसा के रखिए एक साँवली मूरत को। साँवली मूरत भगवान श्री कृष्ण के मोहनी सूरत की याद दिलाता है।
भगवान श्री कृष्ण जाफ़र रज़ा को अतिप्रिय थे। उनकी श्री कृष्ण भक्ति में रचा हुआ यह दोहा प्रस्तुत है:
कृष्ण की बंसी में जादू है कोई राधा हो।
मौज रफ़्तार लचक जायेगी पायल ही नहीं।।
अनवर जलालपुरी द्वारा रचित उर्दू शाइरी में गीता एक महत्वपूर्ण कृति है जिसमें कवि ने श्रीमद् भगवत गीता के अठारह अध्याय के सात सौ श्लोक का पद्यानुवाद सात सौ अशआर में बड़ी कुशलता और सफलता पूर्वक किया है। श्रीमद् भगवत गीता के प्रथम अध्याय का अनुवाद करते हुए उन्होंने लिखा है कि:
कहानी तो संजय सुनाता रहा।
है मैदां क्या बताता रहा।।
वो मैदां जो था जंग ही के लिए।
वहीं से जले धरम के भी दिए।।
धृतराष्ट्र आँखों से महरूम थे।
मगर ये न समझो कि मासूम थे।।
श्रीमद् भगवत गीता के सात सौ श्लोक का उर्दू शाइरी में पद्यानुवाद करना एक मुश्किल कार्य है लेकिन अनवर जलालपुरी ने जिस ख़ूबसूरत और उत्कृष्ट शैली में सफलता एवम् कुशलता पूर्वक अनुवाद छंदबद्ध किया है वह प्रशंसनीय है। कुरुक्षेत्र के मैदान में प्रभु श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद को अनवर जलालपुरी ने बड़ी निपुणता के साथ प्रस्तुत किया है। इस संदर्भ में कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं:
ये सुन सुन कर अर्जुन भी बेचैन था।
सवाल उसने केशव से ही कर दिया।।
बताएं मुझे कौन है मुतमईन ।
मेरे वास्ते है समझना कठिन।।
किसे ज्ञान और ध्यान वाला कहूँ।
हक़ीक़त समझ कर मैं किसकी सुनूँ।।
मुकम्मल उन्हें देखा है मुझे।
वो क्या हैं उन्हें जानना है मुझे।।
इस प्रकार हम देखते हैं कि उर्दू साहित्य में बहुत बड़ी संख्या में उर्दू के कवियों ने लीलाधारी प्रभु श्री कृष्ण के व्यक्तित्व एवम् कृतित्व को अपनी कविताओं में बड़ी कुशलता और सफलता पूर्वक वर्धित किया है और उनकी महिमा एवम् भक्ति के गीतों का गुणगान किया है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आज इक्कीसवीं सदी की तीसरी दहाई में जब राजनीतिज्ञों ने भाषा एवम् धर्म का सहारा लेकर भारत की धार्मिक एवम् सांस्कृतिक संप्रभुता, अखंडता और आपसी सौहार्द्र का वातावरण को धूमिल करने का प्रयास कर रहे हैं तो ऐसी परिस्थिति और वातावरण में मुस्लिम साहित्यकारों ने हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों का जो अनुवाद उर्दू भाषा किया है उसकी अर्थवत्ता,मूल्यवत्ता, उपयोगिता और उपादेयता काफ़ी हद तक बढ़ जाती है। इस प्रकार अगर यह कहा जाए कि भारत की गंगा यमुना साझा संस्कृति को आगे बढ़ाने में इन साहित्यकारों एक अद्वितीय और महान कार्य किया है तो शायद ग़लत नहीं होगा।

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