शायर फ़िराक़ गोरखपुरी की जयंती
फ़िराक़ गोरखपुरी के जन्म जयंती की पूर्व संध्या पर सजी शायरी की महफ़िल

हिदुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज के तत्वावधान में फ़िराक़ गोरखपुरी के जन्म जयंती की पूर्व संध्या पर मुशायरे का भव्य आयोजन किया गया। मुशायरे का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती जी की प्रतिमा तथा फ़िराक़ गोरखपुरी के चित्र पर माल्यापर्ण के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रारम्भ में सम्मानित शायरों का स्वागत शाल,पुष्पगुच्छ एवं प्रतीक चिह्न प्रदान कर एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने किया। मुशायरे की सदारत वरिष्ठ शायर डा.फ़ाज़िल अहसन हाशमी, एसोसिएट प्रोफेसर, उर्दू विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय ने कहा कि फ़िराक़ की शायरी इश्क़ का काव्यशास्त्र है जो आइन-ए-हयातों कायनात है। इनकी शायरी में अवामी तजर्बों की गूँज सुनाई देती है। इन्होंने हयाते इश्क़ का मक़सद ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की पहचान बताया है। इनकी शायरी जज़्बात से पैदा होने शब्द की तलाश है। मुशायरे की निजामत युवा शायर कुमार विकास ने किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने कहा फिराक साहब केवल उर्दू शायरी के बड़े नाम नहीं थे, बल्कि वे भारतीय गंगा-जमुनी तहजीब, प्रेम, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक सौहार्द के सशक्त स्वर थे। उनकी शायरी में प्रेम है, विरह है, जीवन का दर्शन है और इंसान को इंसान से जोड़ने वाली गहरी संवेदना भी है। उनकी रचनाएँ हमें यह विश्वास दिलाती हैं कि भाषा और साहित्य की असली शक्ति मनुष्यों के बीच दूरी मिटाने में है। आज का यह मुशायरा केवल शेरो-शायरी की महफिल नहीं, बल्कि फिराक की साहित्यिक विरासत को स्मरण करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक सुंदर प्रयास है। जब मंच पर शायर अपने शब्दों से भावनाओं को आवाज देंगे, तो निश्चित रूप से हमें फ़िराक़ की उस रचनात्मक परंपरा की याद आएगी, जिसमें सौंदर्य के साथ-साथ जीवन और समाज की गहरी समझ भी मौजूद है। मुशायरे में डाॅ. फ़ाज़िल अहसन हाशमी, लखनऊ, एम. एस. खान (प्रयागराज), डाॅ. नीलिमा मिश्रा (प्रयागराज), डाॅ. प्रीता बाजपेयी(प्रयागराज), तरन्नूम नाज (फतेहपुर), शैलेन्द्र मुधुर(प्रयागराज), मखदूम फूलपुरी (प्रयागराज), अतिया नूर (प्रयागराज), कुमार विकास (कौशाम्बी) मिस्वाह इलाहाबादी (प्रयागराज) ने अपने कलाम पेश कर मशहूर गज़लकार फ़िराक़ को याद किया। मुशायरे में शोअरा ने अपनी रचनाओं में सभी रसों से सराबोर किया तथा समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हुए रचना पाठ किया। विशेषकर सामाजिक सरोकारों से रुबरु होते हुए रचनाकारों ने रचनाओं में विविध रंग उड़ेले जिनका रसास्वादन करके श्रोता भाव विभोर हो गये। समस्त शोअरा की रचना-पाठ साथ में संलग्न है –
कार्यक्रम के अंत में एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर धर्मराज पटेल पर्वू सांसद, रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा, हसन नकबी, डाॅ. नीरज, राकेश मालवीय, गोपालजी पाण्डेय, वज़ीर खान, सफदर काज़मी, संतोष कुमार मिश्रा, आलोक मालवीय, शरद श्रीवास्तव, सुनील दानिश सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य आदि उपस्थित रहे।
(रतन पाण्डेय)
प्रशासनिक अधिकारी
फ़िराक़ गोरखपुरी जन्म-जयंती मुशायरा
27 अगस्त 2026, गुरूवार, अपराह्न – 3ः00 बजे
कार्यक्रम स्थल – ‘गाँधी सभागार’ हिन्दुस्तानी एकेडेमी उत्तर प्रदेश, प्रयागराज
रचनाकारों की पंक्तियां –
हमारे भी जुनूँ का सिलसिला मिलता है मजनूँ से
मोहब्बत में वही करते हैं हम जो ठान लेते हैं।
खरा खोटा सब कुछ सामने आ जायेगा ‘फ़ाज़िल’
हटा कर आँख से पट्टी अगर मीज़ान लेते हैं।
डाॅ. फ़ाज़िल अहसन हाशमी (लखनऊ)
वो आसमान पे उड़ता हुआ परिन्दा हैं,
अदब नवाजों के जेह्नों का वो बासिन्दा हैं।
उन्हें खि़राजे-अकीदत मैं पेश करता हूँ
फ़िराक़ जिन्दा थे, जिन्दा रहेंगे, जिन्दा है।
शैलेन्द्र मधुर (प्रयागराज)
सितमगरों में कभी अपना नाम मत करना
गिरो निगाह से सबकी वो काम मत करना
कोई मरीज न मर जाए जाम में फंस कर
कभी खुदा के लिए रोड जाम मत करना
मख़दूम फूलपुरी (प्रयागराज)
वो खफा हो गए बस इसी बात पर
सामने उनके क्यूं आइना रख दिया।
अतिया नूर (प्रयागराज)
गजल की बात जब उर्दू में छेड़ी जाएगी,
हमें फिराक़ कि फिर याद बहुत आएगी..
कुमार विकास (कौशांबी)
मैं अमन -ओ प्यार का पैगाम अपने साथ लायी हूँ
फेराक -ए याद की एक शाम अपने साथ लायी हूँ
बहुत से लोग कहते हैं के शीरी है जबां उर्दू
उसी शीरी जबां का जाम अपने साथ लायी हूँ
मिस्बाह इलाहाबादी
जिंदगी इम्तिहान तक पहुँची
आशिक़ी राष्ट्रगान तक पहुँची
सरफरोशी की हसरतें उनकी
मुल्क के स्वाभिमान तक पहुँची।।
डॉ. नीलिमा मिश्रा (प्रयागराज)
अपना अपनों से आज हारा है
दर्द में ये जहान सारा है
सारे रिश्तों को हम निभाते हैं
इसमें नुकसान क्या तुम्हारा है
तरन्नुम नाज (फतेहपुर)
दर्द तो दर्द का एहसास बढ़ा देता है।
शिद्ते दर्द में ये और मजा देता है।।
दर्द एक फूल कुदरत की अता है शाहिद।
उसको मिलता है जो खुद को मिटा देता है।।
एम एस खान (प्रयागराज)
कहीं रौशनी कहीं तीरगी यही इस जहां का निजाम है
ये तो अपना अपना नसीब है कहीं सुबह तो कहीं शाम है।
प्रीता बाजपेयी (प्रयागराज)
