साहित्य के क्षेत्र में भारतीय सैनिकी विद्यालय का गौरव बढ़ा
अध्यापक डॉ. दिनानाथ पाटील की ‘आज कहानी’ पर आधारित आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित

मुंबई श्रीकेश चौबे:-भारतीय सैनिकी विद्यालय एवं कनिष्ठ महाविद्यालय, खडवली के अध्यापक एवं साहित्यप्रेमी डॉ. दिनानाथ पाटील की हिन्दी साहित्य पर आधारित महत्वपूर्ण आलोचनात्मक पुस्तक का प्रकाशन हुआ है। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. राजेन्द्र मिश्र के कथा-साहित्य एवं उनकी चर्चित ‘आज कहानी’ की अवधारणा पर केंद्रित इस पुस्तक मंं समकालीन हिन्दी कहानी के बदलते स्वरूप, सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं का व्यापक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
डॉ. दिनानाथ पाटील ने इस पुस्तक के माध्यम से हिन्दी कहानी की विकास-यात्रा को विभिन्न साहित्यिक आंदोलनों और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने का प्रयास किया है। प्रेमचन्द के सामाजिक यथार्थ से लेकर नई कहानी, समानान्तर कहानी, स्त्री एवं दलित विमर्श तथा उत्तर-आधुनिक कथा-चेतना तक हिन्दी कहानी में आए परिवर्तनों को उन्होंने अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से रेखांकित किया है।
पुस्तक का प्रमुख आकर्षण डॉ. राजेन्द्र मिश्र के पाँचों कहानी-संग्रहों का क्रमबद्ध अध्ययन है। इन कहानियों में महामारी, आतंकवाद, स्त्री-जीवन, पारिवारिक विघटन, धार्मिक-सांस्कृतिक तनाव, सामाजिक असमानता, मानसिक अवसाद तथा मानवीय करुणा जैसे समकालीन जीवन के अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों को रेखांकित किया गया है। लेखक ने ‘आज कहानी’ को किसी स्थापित कथा-आंदोलन के विरोध के रूप में न देखते हुए वर्तमान समय की बदलती परिस्थितियों से विकसित कथा-दृष्टि के रूप में समझाने का प्रयास किया है।
डॉ. पाटील के अनुसार आज का मनुष्य विज्ञान और तकनीक के विकास के बीच अनेक नई सुविधाओं से जुड़ा है, लेकिन साथ ही अकेलेपन, संबंधों में बदलाव, मूल्य-संकट, सामाजिक तनाव और असुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना भी कर रहा है। ऐसे समय में कहानी का दायित्व केवल घटनाओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि समय के भीतर छिपे मनुष्य, उसकी संवेदना, संघर्ष और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करना भी है। पुस्तक इसी दृष्टिकोण से ‘आज कहानी’ की वैचारिक एवं रचनात्मक पृष्ठभूमि को सामने लाती है।
लेखक ने पुस्तक में आलोचना को केवल किसी रचनाकार के पक्ष अथवा विपक्ष में निर्णय देने की प्रक्रिया न मानते हुए संवाद और नए विमर्श की संभावनाओं को विस्तृत करने का माध्यम माना है। उन्होंने डॉ. राजेन्द्र मिश्र के कथा-साहित्य की रचनात्मक विशेषताओं के साथ-साथ आलोचनात्मक अध्ययन की आवश्यकता वाले पक्षों पर भी विचार किया है।
यह पुस्तक शोधार्थियों, अध्यापकों, विद्यार्थियों, साहित्यिक आलोचकों और हिन्दी कहानी के गंभीर पाठकों के लिए उपयोगी संदर्भ-सामग्री के रूप में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पुस्तक के माध्यम से समकालीन हिन्दी कहानी और ‘आज कहानी’ की अवधारणा पर नए साहित्यिक विमर्श को गति मिलने की अपेक्षा व्यक्त की जा रही है।
भारतीय सैनिकी विद्यालय जैसे अनुशासित शैक्षणिक संस्थान में अध्यापन कार्य के साथ साहित्य के क्षेत्र में डॉ. दिनानाथ पाटील द्वारा किए गए इस कार्य से विद्यालय परिवार में प्रसन्नता का वातावरण है। उनके इस साहित्यिक योगदान के लिए विद्यालय के शिक्षक-शिक्षकेतर कर्मचारी, विद्यार्थी, साहित्यप्रेमी एवं शुभचिंतकों ने उन्हें बधाई देते हुए आगामी साहित्यिक कार्यों के लिए शुभकामनाएँ दी हैं।
डॉ. पाटील ने अपनी पुस्तक के माध्यम से यह विचार प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है कि “साहित्य केवल समय का दर्पण नहीं, बल्कि समय का विवेक भी होता है।” इसी विचार को केंद्र में रखकर प्रस्तुत यह पुस्तक समकालीन हिन्दी कहानी को समझने की दिशा में एक सार्थक साहित्यिक प्रयास के रूप में सामने आई है।
उल्लेखनीय है कि डॉ. दिनानाथ पाटील की यह आलोचनात्मक कृति श्री वीरेंद्र शुक्ल के विद्या प्रकाशन, कानपुर द्वारा आकर्षक एवं सुरुचिपूर्ण स्वरूप में प्रकाशित की गई है। पुस्तक की सुसज्जित प्रस्तुति और साहित्यिक विषयवस्तु इसे हिन्दी साहित्य के पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाती है। विद्या प्रकाशन, कानपुर ने इस महत्वपूर्ण कृति को साहित्य-जगत् तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

