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व्यक्ति नहीं संस्थान थे प्रो मालवीय,प्रो0ओ पी मालवीय एवं भारती मालवीय स्मृति समारोह सम्पन्न

व्यक्ति नहीं संस्थान थे प्रो मालवीय,प्रो0ओ पी मालवीय एवं भारती मालवीय स्मृति समारोह सम्पन्न

प्रो मालवीय अपने विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान के इतर व्यावहारिक ज्ञान हासिल करने और मानवीय संवेदनाओं से पूर्ण होने पर ज़ोर देते थे. उन्होंने अकेले अपने शिष्यों में जिन मूल्यों को पुष्पित एवं पल्लवित किया उतना करने में देश के बड़े बड़े संस्थानों की पसीने छूट जाते हैं . ये बातें संस्था सरोकार द्वारा आयोजित प्रो ओ पी मालवीय एवं भारती मालवीय पुरस्कार के पंचम संस्करण के अवसर पर मुख्य अतिथि श्री बृजेंद्रमणि त्रिपाठी, जिला एवं सत्र न्यायाधीश गोंडा, ने कहीं. उन्होंने आगे कहा कि प्रो मालवीय ने जो शिक्षा एवं संस्कार बहुत कम समय में उन्हें दिए और जो आत्मविश्वास उनमें पैदा किया उसी के फलस्वरूप उन्होंने जीवन में वो सब कुछ हासिल किया जो आज उनके पास है. इसके पूर्व श्री कृष्णा शंकर मिश्रा ने कहा कि प्रो मालवीय व्यक्ति नहीं संस्थान थे. वे ग्रामीण परिवेश से आने वाले विद्यार्थियों के प्रति गहरी संवेदनाएँ रखते थे एवं उनकी समस्याओं के निवारण के लिए प्रयास करते थे. वे अपने विषय के अतिरिक्त संस्कृत, दर्शन एवं इतिहास सहित अन्य विषयों के भी विद्वान थे एवं छात्रों में इन विषयों के प्रति रुचि पैदा करते थे. आइआइटी दिल्ली में प्रोफ़ेसर डॉ नीरज खरे ने कहा कि यह उनका सौभाग्य था कि लम्बे अरसे तक उन्हें प्रो मालवीय और भारती मालवीय का सानिध्य प्राप्त हुआ. प्रो मालवीय का सबसे बड़ा गुण यह था कि वे साधारण से साधारण व्यक्ति को विशेष होने का एहसास करा देते थे. इसके उपरांत अपनी बात रखते हुए वरिष्ठ कथाकार प्रो अनिता गोपेश ने अपने पिता एवं प्रो मालवीय के बीच गहरी मित्रता को याद करते हुए कहा कि पिता की मृत्यु के बाद उन्हें प्रो मालवीय से पिता जैसा स्नेह ही मिला. वे छोटी छोटी बातों में नहीं उलझते थे और सदैव विनम्र रहते थे. वे एक स्वप्नदर्शी थे एवं एक नए समाज के निर्माण का सपना देखते थे जहां सांप्रदायिक तनाव ना हो, जातिगत भेदभाव ना हो एवं व्यक्ति द्वारा व्यक्ति का शोषण ना हो. वे अपने आस पास के वातावरण को लेकर बेहद सचेत रहते थे और इसी का परिणाम था कि उन्होंने ना केवल अपने मोहल्ले अपितु पूरे शहर में वृहत पैमाने पर वृक्षारोपण करवाया. प्रथम सत्र अध्यक्षता करते प्रो राजेंद्र कुमार ने कहा कि प्रो मालवीय बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे. एक शिक्षक, पर्यावरणविद, संगीतज्ञ के अलावा वे एक एक्टिविस्ट भी थे. जब जब शहर में साम्प्रदायिक तनाव हुआ तो शांति स्थापना के लिए जुलूस में चलने वालों में अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते थे. प्रथम सत्र का संचालन का प्रख्यात गीतकार यश मालवीय ने किया. स्वागत वक्तव्य श्री हरिश्चन्द्र मालवीय ने किया.

प्रथम सत्र के उपरांत वर्ष २०२३ के लिए यह सम्मान वरिष्ठ कथाकार नवीन कुमार नैथानी जी को उनके समग्र लेखन के लिए दिया गया. इस सम्मान के अंतर्गत पच्चीस हज़ार रुपए, अंगवस्त्रम एवं स्मृति चिन्ह दिए जाते हैं.

द्वितीय सत्र में “हिंसा , आज और हिंदी कहानी” विषय पर आयोजित गोष्ठी में वरिष्ठ कथाकार प्रियदर्शन मालवीय ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि हिंदी कहानी देह की चिंताओं से आगे नहीं बढ़ पा रही है और अपने यथार्थ में व्याप्त हिंसा को नहीं दर्ज कर पा रही है. अपनी बात रखते हुए वरिष्ठ आलोचक कुमार वीरेंद्र ने कहा कि ऐसा नहीं है कि हिंदी कहानी अपने समय की हिंसा को नहीं दर्ज कर रही. इसके लिए ज़रूरी है कि हम पहले हिंसा को परिभाषित करें. उन्होंने कहा वर्तमान समय मुख्यतः तीन प्रकार की हिंसा का दौर है- पारिवारिक, कारस्तानी और प्रशासनिक. उन्होंने कहा कि कई बार सत्ता चुप रहती है लेकिन जनता चुप नहीं रहती. इतिहास चुप्पी साधने वालों को क्षमा नहीं करता. आज की कहानी तीनों प्रकार की हिंसा को दर्ज कर रही है. इस संदर्भ में उन्होंने “प्रेम लता वैश्य की कहानी मणिपुरः एक प्रेम कथा, शिरोमणि महतो की कहानी दो पाटों के बीच और संतोष प्रियदर्शी की अंधेरा मेरा शहर में” का विशेष संदर्भ दिया.
अपनी बात रखते हुए नवीन कुमार नैथानी ने कहा कि जबसे हिंदी कहानी की शुरुआत हुई तभी से हिंदी कहानी हिंसा को दर्ज कर रही है. अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए वरिष्ठ उपन्यासकार एवं पूर्व कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि यह आयोजन शहर के सांस्कृतिक कैलेंडर का महत्वपूर्ण पड़ाव हो गया है. उन्होंने कहा कि मालवीय परिवार मेरा परिवार ही है और इस आयोजन के बहाने पुरानी स्मृतियों को जीने का मौक़ा मिलता है. उन्होंने आगे कहा वर्तमान समय में राज्य की हिंसा के नए नए स्वरूप देखने को मिल रहे हैं. उन्होंने कहा कि जबसे राष्ट्र राज्य अस्तित्व में आए हैं तभी से ये मान लिया गया है कि राज्य हिंसा अकेला वैध अधिकारी है और उसके प्रतिकार में जब कोई हिंसा होती है तो राजद्रोह कहा जाता है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दरअसल युद्ध सबसे पहले भाषा के स्तर पर लड़ा जाता है. द्वितीय सत्र का संचालन वरिष्ठ आलोचक संजय श्रीवास्तव ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन आनंद मालवीय ने किया.

तृतीय सत्र में संगीत संध्या का आयोजन किया गया जिसके अंतर्गत सिद्धार्थ मिश्रा ने मेघ मल्हार राग में गायन प्रस्तुत किया. उनके साथ तबले पर संगत श्री विनोद कुमार मिश्रा और हारमोनियम पर विमलेश मिश्रा ने की. सितार वादन श्री आनंद कुमार मिश्रा ने यमन में प्रस्तुत किया. इनके साथ तबले पर पंडित अनूप बनर्जी ने संगत की. इसके उपरांत श्री विनोद द्विवेदी एवं आयुष द्विवेदी ने युगल ध्रुपद गायन प्रस्तुत किया.

इस मौक़े पर प्रो मालवीय के परिवार के अलावा बहुतबड़ी संख्या में साहित्य, कला और संगीत के प्रेमी श्रोता उपस्थित रहे.

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