सनातन धर्म को आगे बढ़ाने नई ऊर्जा का संचार करने को ब्राह्मणों ने किया सामूहिक श्रावणी उपाकर्म

रिपोर्ट-आलोक मालवीय
सनातन धर्म का वैदिक कर्म श्रावणी उपाकर्म है, ब्राह्मण वैदिक काल से शक्ति,ध्यान,संस्कार अर्जन के लिए उपाकर्म करते हैं,तीर्थराज प्रयागराज में गंगा की पवित्र धारा में श्रावणी की गई।माता गंगा के आंचल में खड़े होकर पंच गव्य का स्नान किया गया।सनातनी परंपरा के साथ दूध,गाय के गोबर,शहद,दही से स्नान करके तन और मन शुद्ध किया गया। उसके बाद वैदिक धार्मिक रीति और मंत्रों के साथ यज्ञोपवीत यानी जनेऊ को शुद्ध किया गया।गंगा में श्रावणी करने के बाद सप्त ऋषीयों का वैदिक रीति से पूजन किया गया और सभी के लिये सुख और शांति की प्रार्थना की गई।सनातन धर्म में परंपरा के अनुसार जब वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं श्रावण मास के श्रवण और चाँद का का मिलन होता है अर्थात पूर्णिमा और हस्त नक्षत्र में श्रावण पंचमी को ये उपाकर्म किया जाता है।किसी भी कारण वश कोई ब्राह्मण इस दिन उपाकर्म नही कर पाता तो रिषि पंचमी को यह उपाकर्म करने का विधान है। श्रावणी उपाकर्ण जीवन की वैज्ञानिक परंपरा और प्रकिया है।इस उपाकर्म से मनुष्यता का बोध होता है इसी लिये श्रावणी सामूहिक रूप से की जाती है।
श्रावणी करने से जाने या अनजाने में हुए पाप कर्म से मुक्ति होती है। ये उपाकर्म, तन,मन शुद्ध करने और नई ऊर्जा का संचार करता है।उपाकर्म के लिए यह विधान है कि श्रावण पूर्णिमा के दिन ग्रहण पड़ता है तो यह उपाकर्म श्रावण पंचमी को करना उचित होता है।श्रावणी उपाकर्म करने वालों में पंडित ध्रुव नारायण मालवीय,पंडित कमल शर्मा,पंडित राजेन्द्र पालीवाल,पं0 रोचक त्रिपाठी सहित सैकड़ों ब्राह्मण शामिल रहे।पंडित लक्ष्मी नारायण पांडेय ने वैदिक रीति से श्रावणी उपाकर्म करवाया।
