सबिता चौधुरी रचित बाङ्ला कविता-संग्रह आमि साधारण घोरेर बोउ का हुआ विमोचन

प्रयागराज रवीन्द्रालय, जगत तरन गोल्डन जुबिली स्कूल,प्रयागराज सबिता चौधुरी (25 दिसम्बर 1932 – 10 जून 2020) के कविता-संग्रह के शीर्षक में परिलक्षित है कि वह स्वयं को पारम्परिक सन्दर्भों में महिलाओं की दैनन्दिन क्रियाकलापों में व्यस्त एक साधारण व्यक्ति मानती थीं। उनका बचपन व किशोरावस्था अविभाजित भारत के सुदूरवर्ती उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों में बीते थे, जहाँ उनका पिता सैन्य इंजीनियरिंग सेवा में अभियन्ता थे। इसने उनमें प्रकृति के अद्भुत पक्षों एवं रहस्यों के अनुशीलन व अन्वेषण में एक जीवन-पर्यंत रुचि जगायी, और रोज़मर्रा के अनुभवों पर काव्यात्मक अन्तर्दृष्टियां प्रदान कीं।
सबिता चौधुरी चौदह वर्ष की वय से कविताएं व लघु साहित्यिक रचनाएं लिखने लगी थीं। वह अपनी रचनात्मक कृतियां विद्यालय की अभ्यास पुस्तिकओं व सादे पन्नों में लिखा करती थीं। 17 की वय में रेलवे इंजीनियर श्री सुचित चन्द्र चौधुरी से विवाह के उपरान्त उन्होंने पत्नी, पुत्रवधु, पति के भाई-बहनों, माता व प्रतिवेशियों के सापेक्ष नये दायित्वों का निर्वहन किया। सौभाग्य से उनके पति तथा नये सम्बन्धी उनकी सहितयिक व सांस्कृतिक रुचियों का भरपूर समर्थन करते थे। उनके पति की पर्यटन में गहन रूचि थी, जिसके चलते उन्हें देश के कई भागों की यात्रा के अनेक अवसर मिले। इससे अपने आसपास की परिस्थितियों के प्रति उनके दृष्टिबोध का परिष्कार किया तथा सामाजिक प्रेक्षण का परिष्कार किया। परिवार के बौद्धिक व सांस्कृतिक परिवेश ने उनकी काव्यात्मक सम्वेदनाओं का परिमार्जन किया। वह स्थानीय सामाजिक समूहों व साहित्यिक संगठनों (जैसे पूर्णिमा सम्मेलनी) की गोष्ठियों में अपनी कविताएं प्रस्तुत करती थी, जिन्हें सराहना मिलती थी। तथापि, उन्होंने अपनि रचनाओं के संकलन या प्रकाशन का यत्न नहीं किया, क्योंकि वह उन्हें स्वान्तः सुखाय मानती थीं।
तथापि, जब परिवार का पुश्तैनी आवास खाली किय जा रहा था, तब अभ्यास पुस्तिकाओं व सादे पन्नों में अंकित श्रीमती सबिता की रचनाओं का समग्र मिला, तथा परिजनों ने बाङ्गला विशेषज्ञों से उसके मूल्यांकन का निर्णय लिया। सबिता की सबसे छोटी बहन शीला ने सबसे पहले उनका पारायण किया तथा तदुपरान्त आलोचनात्मक दृष्टि से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की बाङ्गला विभाग की आचार्य सुमिता
चटर्जी व प्रतिष्ठित फिल्म निर्माता-निर्देशक तथा कवि तन्मय नाग ने उनका आकलन कर उनको सराहते हुए, उनके संकलन, मुद्रण व प्रकाशन का दायित्व निभाया। परिवार इन कविताओं को गुमनामी से उबारने में उनकी बहुत आभारी है।
