हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज के तत्वावधान में विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन का हुआ आयोजन

प्रयागराज
हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज के तत्वावधान में विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 10 जनवरी 2026, शनिवार को गाँधी सभागार, हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ0प्र0, प्रयागराज में दो सत्रों में राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम एकेडेमी परिसर में स्थापित पं0 बालकृष्ण भट्ट, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन एवं सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रथम सत्र के प्रारम्भ में एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने आमंत्रित अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शॉल देकर किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए पायल सिंह ने कहा कि ‘‘हिन्दी भाषा विभिन्न कारणों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्व रखती है। यह दुनिया में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन गई है। हिन्दी का प्रभाव भारत की सीमाओं से परे तक फैला हुआ है,’ सगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए मनोज कुमार सिंह, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने कहा कि ‘हिंदी जन की शक्ति ,सर्जना एवं सक्रियता से ही हिंदी भाषा विश्वभाषा के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकती है। हिंदी जन की आर्थिक, सांस्कृतिक सम्पन्नता हमें आश्वस्त करती हैं कि वह 21वीं सदी की दुनिया में एक शक्तिशाली भाषा के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करेगी।’ संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. मुन्ना तिवारी, हिन्दी विभाग बुन्देलखण्ड विश्वविद्याल झांसी कि ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘हिन्दी आज केवल एक राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि संप्रेषण, संस्कृति और संवेदना की वैश्विक भाषा के रूप में अपनी पहचान सुदृढ़ कर रही है। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मंचों, डिजिटल माध्यमों और वैश्विक बाज़ार में हिन्दी की उपस्थिति इसके विश्वभाषा बनने की दिशा में निर्णायक संकेत देती है। आज हिन्दी विश्वभाषा बनने की प्रक्रिया में नहीं, बल्कि विश्व-चेतना से संवाद करने वाली सशक्त भाषा के रूप में अग्रसर है।’ राष्ट्रीय संगोष्ठी की विशिष्ट वक्ता प्रो. सरोज सिंह, सी. एम पी डिग्री कालेज, प्रयागराज ने कहा कि ’हिन्दी भारतीय अस्मिता की प्रतीक और अंतर्संवाद की भाषा है,जो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में बोली जाती है।विश्व पटल पर हिंदी के बढ़ते कदम में शिक्षा,प्रौद्योगिकी, मीडिया,सिनेमा , ओ टी टी, हिन्दी गीतों और सांस्कृतिक आदान प्रदान का बहुत योगदान है। हिन्दी को विश्व व्यापी बनाने में प्रवासी भारतीयों का बहुत योगदान है। हिन्दी प्रचार संस्थाओं और विश्व हिन्दी सम्मेलनों ने भी हिन्दी की वैश्विक क्षमता को दर्शाया है।’ संगोष्ठी के दूसरे विशिष्ट वक्ता डॉ. विजयानंद, अन्तर्राष्ट्रय अध्यक्ष, वैश्विक हिन्दी महाससभा, प्रयागराज ने कहा कि ‘ विश्व हिंदी सम्मेलनों से हिंदी का प्रचार विश्वभर में बढ़ा है ,लोगों में जागरूकता आई है। यही कारण है कि नेपाल, मॉरीशस, फिजी, चीन, नीदरलैंड,अमेरिका, रूस ,ब्रिटेन ,जापान आदि में भी हिंदी का शिक्षण एवं प्रचार प्रसार खूब बढ़ा है। हिंदी विश्वभाषा की ओर बढ़ रही है, क्योंकि यह वैश्विक एकता एवं समन्वय की भाषा है।’ कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन में आमंत्रित रचनाकारों का स्वागत एवं सम्मान एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने किया। जिसमें अम्बरीष ठाकुर (लखनऊ), प्रो. बलवंत सिंह (लखनऊ), वीरेन्द्र कुमार तिवारी (प्रयागराज), डॉ. विजयानंद (प्रयागराज), डॉ. प्रीता बाजपेयी (प्रयागराज), गंगा प्रसाद त्रिपाठी (प्रयागराज), ज्योतिर्मयी (प्रयागराज), विवेक सत्यांशू (प्रयागराज), आभा मधुर (प्रयागराज), डॉ. पीयूष मिश्र ‘पीयूष’ (प्रयागराज) ने काव्य पाठ किया। कवि सम्मेलन में कवियो ने कविता के सभी रसों से सराबोर किया तथा समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हुए कविताएँ सुनायी गयीं। विशेषकर सामाजिक सरोकारों से रुबरु होते हुए रचनाकारों ने रचनाओं में विविध रंग उड़ेले जिनका रसास्वादन करके श्रोता भाव विभोर हो गये।
रचनाकारों की पंक्तियां –
मातृभूमि की भाषाएँ मिल हिन्दी को अपनायेंगी।
फूट डालने वालों को अब अच्छा सबक सिखायेंगी ।
वीरेंद्र तिवारी
किताबें पढ़ते वक्त मुझे लगा की किताब पढ़ना भी घूमने या प्रेम करने के अनुभव जैसा ही है मैं लंदन नहीं गया लेकिन डिकेन्स के माध्यम से लंदन को देख लिया इससे मुझे लगा की किताबों का कोई विकल्प नहीं है – विवेक सत्यांशु
शब्द उठते हैं,शब्द गिरते हैं
शब्द चल पड़ते हैं,चलते ही जाते हैं
– ज्योतिर्मयी
हवा का रुख़ बदलना चाहते हैं,
दिए हैं और जलना चाहते हैं।
अम्बरीष ठाकुर
कभी मंज़िल नहीं मिलती कभी रस्ता नहीं मिलता।
मुक़द्दर चाहिए जैसा कभी वैसा नहीं मिलता।
प्रो. बलवन्त सिंह
भाषा परिभाषा उत्साह से भरी हुई है, भारतीय तिरंगे की शान मेरी हिंदी,
वसुधैव कुटुंबकम की भावना प्रधान रही, संस्कृति की नायिका है ध्यान मेरी हिंदी,
डॉ आभा श्रीवास्तव ‘मधुर’
मस्तक पर टीका है, माथे की बिन्दी है।
कोटि कोटि कण्ठों की अभिलाषा हिन्दी है।
डॉ. पीयूष मिश्र ‘पीयूष’
वह दिन भी जल्दी आएगा, जब हिंदी विश्व भाषा होगी।।
भारत की राष्ट्रभाषा होगी। संयुक्त राष्ट्र में छाएगी।।
वह दिन भी जल्दी आएगा। जब हिंदी विश्व भाषा होगी।।
डॉ० विजयानन्द
ये तुलसी ये मीरा, ये रसखान की मिट्टी है
ये गांधी, ये बिस्मिल के बलिदान की मिट्टी है
गंगा प्रसाद त्रिपाठी
अगर हम चाह लें तो पर्वतों के पार उड़ जाएं
हमारे रास्ते सब मंजिलों की ओर मुड़ जाएं
चमक आ जाएं आंखों में खनक आ जाए वाणी में
हमारे देश के वासी अगर हिंदी से जुड़ जाएं
प्रीता बाजपेयी
कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुजीत कुमार सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज तथा कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद ज्ञापन एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में डॉ. उषा मिश्रा, डॉ. विनम्रसेन सिंह, देवी प्रसाद म्श्रिा ‘वेदांती, शैलेन्द्र मधुर गोपालजी पाण्डेय सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
