संत रविदास जी की जयंती पर विशेष
सर्जनात्मकता के सेतु : संत रविदास

लेख..डॉ. ममता
शोधार्थी
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय- नई दिल्ली
मध्यकालीन कवियों में संत रविदास का महत्वपूर्ण स्थान है। इनका जन्म सन 1388 में माघ पूर्णिमा के दिन उत्तर प्रदेश बनारस में हुआ था । इतिहास में रविदास समाजसुधारक, संत एवं कवि के रूप में जाने जाते हैं। इनका अविर्भाव ऐसे समय में हुआ था, जब देश में विदेशी सत्ता का प्रभुत्व था । तत्कालीन परिस्थितियों में जातिगत भेदभाव, छुआछूत, वर्णगत वैषम्य, ईर्ष्या -द्वेष, तथा प्रतिशोध की भावनाएं प्रबल थीं। दासता, लूट, चोरी, भुखमरी, दरिद्रता तथा भ्रष्टाचार समाज में व्यापक रूप में विद्यमान था | समाज धार्मिक, सांस्कृतिक दृष्टि से द्रिग्भ्रमित था | समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा था। ऐसे समय में संत रविदास जी ने सामाजिक और सावर्जनिक हितों को ध्यान में रखकर अपने काव्य में प्रगतिशील विचारों एवं नैतिक उपदेशों के माध्यम से समता एवं मानवता पर बल दिया ।

भारतीय ज्ञान परम्परा में अपने जीवन मूल्यों को संरक्षित करने की बात कही गयी है। भारतीय संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है, जो मनुष्य के पवित्र कर्मों की पूजा करती है। जो किसी व्यक्ति विशेष में निहित होते हैं। संत रविदास विशेष ही थे। जिन्होंने अपने विचारों में जीवन मूल्यों को संरक्षित किया ।
उन्होंने समाज में समानता के पक्ष में अपनी आवाज उठाई | उनका मानना था कि सभी मनुष्य एक समान हैं। न कोई छोटा है न कोई बड़ा है। उन्होंने आदर्श राज्य बेगमपुरा की कल्पना की | जहाँ पर सभी लोग सुखी सम्पन्न रहें। वे इस आदर्श राज्य की कल्पना करते हुए कहते हैं- ”
“ऐसा चहुँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न | छोट-बड़ो सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न ||

संत रविदास अपनी प्रेम की दुनिया में स्वाधीन लोक की कल्पना करते हैं। मनुष्य की दासता को वे अभिशाप मानते हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति का महत्व उसकी स्वाधीनता एवं सर्जनात्मकता में निहित है। उन्होंने अपने विचारों में मनुष्य की सर्जनात्मक एवं सकारात्मक शक्ति को अभिव्यक्त किया है। उनकी यह पंक्ति सूक्त वाक्य के रूप में देखी जा सकती है “मन चंगा तो कठौती में गंगा ।” यह पंक्ति किसी व्यक्ति के अन्दर उपस्थित उसकी रचनात्मक शक्ति की वकालत करती है। जब मनुष्य का मन पवित्र होता है तो उसका कर्म ही तीर्थस्थल बन जाता है । दरअसल संत रविदास चर्मकार (चमार) जाति से सम्बन्ध रखते थे | जूता बनाना उनका पैतृक व्यवसाय था | उन्होंने इस व्यवसाय को सहर्ष अपनाया था | क्योंकि उनका यह व्यवसाय उन्हें स्वरोजगार से जोड़ता था | यह रोजगार ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाता था | उन्होंने कभी अपनी जाति और व्यवसाय को कमतर नहीं समझा | जूता बनाने को वे अपनी प्रतिभा से जोड़कर देखते थे | उन्होंने कर्म को ही धर्म माना | भाग्य और नियति से अधिक कर्म पर बल दिया | जिससे व्यक्ति अपनी आर्थिक तंगी से ऊपर उठकर अपनी दयनीय परिस्थितियों से उबर सकता है | तत्कालीन समय में यह व्यवसाय बेशक जाति आधारित रहा हो लेकिन आज के समय में यह जाति के बंधन को तोड़ चुका है। बड़े बड़े ब्रांड इससे जुड़ चुके हैं। वर्तमान समय में सरकार भी स्किल आधारित ज्ञान को बढ़ावा दे रही है। भारत सरकार एवं राज्य सरकार मिलकर युवाओं को रोजगार योग्य बनाने एवं आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनायें चला रही हैं। संत रविदास के आदर्शों, शिक्षा, स्वरोजगार एवं सामाजिक समरसता को आगे बढ़ाने के लिए ‘संत रविदास शिक्षा सहायता/प्रोत्साहन योजना, संत रविदास स्वरोजगार योजना’ कार्यरत हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य गरीब-श्रमिक बच्चों की शिक्षा, आर्थिक सहायता इत्यादि प्रदान करना है। सरकार की ये योजनाएं समाज के उन वर्गों को शसक्त बनाने में सहयोगी हैं, जो सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हैं।
संत रविदास ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा को सर्वोपरि रखा | अपने काव्य में अभिव्यक्त विचारों के माध्यम से मनुष्य को कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और सहिष्णु बने रहने की सलाह दी | भारतीय संस्कृति में संत रविदास जी ने जिन जीवन मूल्यों को स्थापित किया उनकी प्रासंगिकता सदैव बनी रहेगी |
