जीवनशैली में सुधार डायबिटीज़ का उपचार – डॉ जी एस तोमर

आरोग्य भारती एवं झूँसी डॉक्टर्स एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में डाबर के सौजन्य से “मैनेजमेंट ऑफ डायबिटीज़-एन इण्टीग्रल एप्रोच” विषय पर एक सीएमई का आयोजन किया गया । जिसकी अध्यक्षता एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ जी पी शुक्ला ने किया । मंच पर वरिष्ठ सर्जन डॉ अरविन्द श्रीवास्तव, वरिष्ठ चिकित्सक डॉ वी के पाण्डेय, आरोग्य भारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो.(डॉ) जी एस तोमर आयुर्वेद चिकित्सक डॉ विनोद कुमार एवं डॉ वी एन त्रिपाठी, उपस्थित रहे । संचालन आरोग्य भारती के वरिष्ठ कार्यकर्ता डॉ अवनीश पाण्डेय एवं एसोसिएशन के सचिव डॉ प्रमेश श्रीवास्तव ने संयुक्त रूप से किया । अपने उद्बोधन में विश्व आयुर्वेद मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं आरोग्य भारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ जी एस तोमर ने डायबिटीज़ को एक जीवनशैली जन्य रोग बताया । इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वेद विश्व वांग्मय के प्राचीनतम ग्रंथों के रूप में स्वीकार्य हैं । डायबिटीज़ का इतिहास भी उतना ही प्राचीन है । वैदिक वांग्मय में इसे प्रमेह / मधुमेह माना गया है । इन प्राचीन ग्रंथों में इस रोग के निदान, लक्षण और चिकित्सा का अत्यन्त वैज्ञानिक वर्णन मिलता है । आरामतलब जीवनशैली, खानपान की गड़बड़ी एवं बढ़ती हुए मानसिक तनाव से इन रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है । यहाँ तक कि प्रत्येक परिवार में कोई न कोई इस रोग का शिकार है । प्रति दस लोगों में एक इससे पीड़ित है । डॉ तोमर ने बताया कि इसकी मेटाबॉलिक सिंड्रोम, प्रीडायबिटीज़ एवं डायबिटीज़ तीन अवस्थाएँ होती हैं । मेटाबॉलिक सिंड्रोम में ब्लड सुगर तो सामान्य रहती है किन्तु कोलेस्ट्रॉल बढ़ा होता है एवं सेन्ट्रल ओबेसिटी (मोटापा) मिलती है । इसे मात्र खान पान के नियंत्रण एवं नियमित व्यायाम से नियंत्रित किया जा सकता है । दूसरी अवस्था जब ब्लड सुगर खाली पेट 126 मिग्रा से कम तथा खाने के बाद की 200 से कम हो तब उसे प्रीडायबिटीज की श्रेणी में रखा जाता है । इस अवस्था में आहार नियंत्रण, नियमित व्यायाम एवं हर्बल आयुर्वेदिक औषधियाँ पर्याप्त लाभकारी होती हैं । जब ब्लड सुगर इस सीमा से अधिक हो जाती है तब इसे डायबिटीज़ कहा जाता है । इस अवस्था में ओरल हाइपोग्लाइसिमिक औषधियाँ या इन्सुलिन आवश्यकतानुसार उपयोगी है । उन्होंने कहा कि इन औषधियों के साथ साथ आयुर्वेद औषधियों के प्रयोग से न केवल पाश्चात्य औषधियों की सक्रियता बढ़ने से उनकी मात्रा में कमी लाई जा सकती है अपितु शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सकता है । डॉ विनोद कुमार ने डायबेटिक रेटिनोपैथी पर अपने विस्तृत विचार साझा किए । डॉ अरविंद श्रीवास्तव ने डायबिटीज़ को मूल रूप से हेरीडिटरी रोग बताया तथा खानपान एवं अन्य कारणों को इसकी उत्पत्ति में सहायक बताया । उन्होंने इन्सुलिन रजिस्टेन्स पर भी अपने अनुभव साझा करते हुए इसके नियंत्रण में संयमित जीवनशैली को महत्वपूर्ण बताया । डॉ वी के पाण्डेय ने अपने बचपन की जीवनशैली का ज़िक्र करते हुए नंगे पाँव चलने से लेकर खेलकूद, दौड़-भाग वाले शारीरिक श्रम के महत्व को डायबिटीज़ के परिप्रेक्ष्य में उपयोगी बताया । अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ जी पी शुक्ला ने डायबिटीज़ की घातकता का ज़िक्र करते हुए बताया कि शरीर का प्रत्येक अंग इस रोग से क्षतिग्रस्त होता है । अत: इसका बचाव ही सर्वोत्तम उपचार है । आहार संयम, सक्रिय जीवनशैली एवं काल भोजन से इससे बचा जा सकता है । कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने एक दूसरे को हर्बल गुलाल लगाकर होली के रंगों का आनंद लिया । इस कार्यक्रम में डॉ एसएन यादव, डॉ के के सिंह, डॉ संदीप शुक्ला, डॉ आशीष मौर्य, डॉ आशुतोष श्रीवास्तव, अनुराग अष्ठाना, राजेन्द्र कुमार सिंह, आशीष तोमर सहित लगभग पैंतीस चिकित्सकों ने प्रतिभाग किया ।
