भारतीय ज्ञान परम्परा और लोक साहित्य विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ०प्र०, प्रयागराज के तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और लोक साहित्य’ विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गांधाी सभागार में दो सत्रों में किया गया। सर्वप्रथम एकेडेमी परिसर में स्थापित पं0 बालकृष्ण भट्ट, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन एवं सुभद्रा कुमारी चैहान की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रथम सत्र के प्रारम्भ में एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने आमंत्रित अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शाॅल देकर किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए पायल सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा जो कि ऋषियें, मुनियों के द्वारा वेदों उपनिषदों के माध्यम से लोक साहित्य, जीवन दर्शन और नैतिक शिक्षा के पथ प्रदर्शक हैं, जो कि भारतीय संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के द्वारा लोक साहित्य को समृद्ध करते हैं।,’ प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ० आर०पी० सिंह, पूर्व निदेशक, उच्च शिक्षा विभाग, उ०प्र० ने कहा कि ‘आदि काल से ऋषियों, मुनीयों एवम् मनीषाण ने अपने ज्ञान, तपस्या एवम साधनाओं से अर्जित ज्ञान का वेदों, पुराणों और उपनिषदों के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरण हेतु साहित्य एवं लोक कथाओं के द्वारा जन सामान्य के अनुकरण हेतु सुलभ कराया है। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो० अजय प्रकाश खरे, प्राचार्य, सी०एम०पी० डिग्री कॉलेज, प्रयागराज नेे अपने वक्तव्य में कहा कि ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य दोनों पृथक नहीं है।, लोक साहित्य के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा जन जन तक पुहँचती है। भारतीय ज्ञान परंपरा ओर लोक पंरपरा दोनों ही शामिल है और भारतीय संस्कृति को समृद्व करते हैं।’ राष्ट्रीय संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ० सत्यप्रिय पाण्डेय, श्याम लाल महाविद्यालय, दिल्ली ने कहा कि ‘भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने में जितना श्रेय शास्त्रों का रहा है उससे रंच मात्र भी कम श्रेय लोक का नहीं रहा है । जिस वेद, पुराण , उपनिषद के ज्ञान की बात कही जाती है उसे लोक जनमानस में उनकी भाषा में पहुंचाने का श्रेय लोक कवियों को है, लोक रचनाकारों को है, संतों का है अन्यथा ये ज्ञान शास्त्र की पोथियों में बंद पड़ा रहता, आम जन मानस तक प्रसारित न हो पता । भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने का यह कार्य लोक ने अपनी कहावतों , लोक गीतों, लोक कथाओं और लोक नाट्यों के माध्यम से किया है । अतः लोक साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा की धरोहर मौजूद है, यह धरोहर वैदिक सूत्रों की तरह लोकोक्तियों में विद्यमान है ।’ विशिष्ट वक्ता डॉ० कल्पना वर्मा, पूर्व आचार्य, आर्यकन्या डिग्री कॉलेज, प्रयागराज ने कहा कि ’भारतीय ज्ञान परम्परा बहुत पुरानी है। भारतवर्ष के युगद्रष्टा महर्षियों का भौतिक एवं पराभौतिक प्रकृति से किया गया संवाद, उनकी सामाजिक और आध्यात्मिक दिशाओं को जोड़ने वाली जीवन शैली तथा उनके चिन्तन पूर्ण अनुभव भारतीय ज्ञान परम्परा की धरोहर हैं। यह परम्परा मौखिक और लिखित दोनों माध्यमों से आगे बढ़ी है। आदिवासी समाज से लेकर वेद-पुराण- उपनिषद-रामायण-महाभारत-गीता आदि धर्म ग्रन्थों, लोक कथाओं, लोक गीतों, कहावतों तथा साहित्य आदि में संरक्षित है। सर्वे भवन्तु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम, अतिथि देवो भव का संदेश ज्ञान परम्परा से ही आया है। भारतीय ज्ञान की यह परंपरा लोक की ताकत है और जीवन को राह दिखाने वाली है।’ इस सत्र का संचालन डॉ0 सुजीत कुमार सिंह, इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने किया। राष्ट्रीय सुंगोष्ठी के द्वितीय सत्र के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान एकेडेमी के प्रशासनिक अधिकारी रतन पाण्डेय ने किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप, सुलतानपुर ने कहा कि ‘ हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा व्यापक एवं समृद्ध रही है, जो वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों व शास्त्रों से पूर्व लोक साहित्य के रूप में विकसित हुई है। यह परम्परा मात्र दार्शनिक और आध्यात्मिक चिन्तन तक सीमित नहीं रही अपितु समाज को नैतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध करने में भी सहायक रही है। इस ज्ञान परम्परा को जन सामान्य तक पहुँचाने में सन्त साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।’ संगोष्ठी की विशिष्ट वक्ता प्रो० राकेश सिंह, आचार्य, इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने कहा कि ‘ भारतीय संस्कृति से जुड़ा सबसे विशिष्ट तथ्य यह है कि यहाँ ज्ञान मात्र ग्रंथों या औपचारिक शिक्षा संस्थानों तक सीमित नहीं रहा है। भारतीय समाज में ज्ञान की अनेक धाराएँ रही हैं-वैदिक, दार्शनिक, शास्त्रीय, लोक और व्यावहारिक। इनमें लोक ज्ञान परम्परा एक ऐसी परम्परा है, जो लिखित ग्रंथों से अधिक सामुदायिक अनुभव और मौखिक परम्परा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रही है। लोक साहित्य इस ज्ञान परम्परा का सबसे सशक्त माध्यम रहा है। ’। संगोष्ठी में अपने वक्तव्य में डॉ० शारदा द्विवेदी, सहायक आचार्य, रानी भाग्यवती महिला महाविद्यालय, बिजनौर ने कहा कि ‘भारतीय ज्ञान परंपरा की श्रेष्ठ परंपराओं का संरक्षण संवर्धन एवं उससे एक श्रेष्ठ भविष्य की निर्मित करना हमारा दायित्व है। हमारा देश केवल आर्थिक शक्तियों से ही महाशक्ति नहीं बन सकता है, वह अपने ज्ञान की शक्ति से महाशक्ति बनेगा अतः हमें अपनी भारतीय ज्ञान प्रणाली- ज्ञान परंपरा अपनी विरासत के प्रति अपने विद्यार्थियों में सम्मान की भावना पैदा करना अत्यंत आवश्यक है।’संगोष्ठी के सम्मानित वक्ता डॉ० रमेश चन्द्र वर्मा, पूर्व सम्पादक, दैनिक जागराण, कानपुर ने कहा कि ‘लोक साहित्य संस्कृतिक चेतना, पहचान, समाज सुधार और राष्ट्रवाद के विषयों का पता लगाने के लिए प्रेरणा स्रोत है। लोक साहित्य ने भारतीय ज्ञान को जन-जन तक पहुंच कर प्रेम, त्याग, साहस, धर्म, कर्तव्य जैसे जीवन मूल्य दिखाएं जिससे संस्कृति समृद्ध बनी।’ इस सत्र का संचालन डॉ० अनिल कुमार सिंह, इलाहाबाद डिग्री कॉलेज, प्रयागराज ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में प्रो. रामकिशोर शर्मा, रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’, डाॅ. पवन कुमार सिंह, डाॅ. सजंय कुमार सिंह, सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
