ब्रह्मा जी के प्रथम यज्ञ स्थल पर गूंजे वैदिक मंत्र, ब्राह्मणों ने लिया धर्म-संस्कृति की रक्षा का संकल्प
श्रावणी उपाकर्म पर दशाश्वमेध घाट पर उमड़ा जनसैलाब, विप्रों ने किया पापों का प्रायश्चित

प्रयागराज।* सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के प्रथम यज्ञ स्थल दशाश्वमेध गंगा घाट पर शनिवार को ब्राह्मणों के सबसे बड़े पर्व श्रावणी उपाकर्म पर वैदिक मंत्रोच्चार से पूरा घाट गूंज उठा। इस अवसर पर सैकड़ों विप्रों ने मां गंगा में आस्था की डुबकी लगाकर अपने जाने-अनजाने पापों का प्रायश्चित किया और धर्म-संस्कृति को बचाने व जनकल्याण का बीड़ा उठाया।
सुबह से ही घाट पर ब्राह्मणों का तांता लगा रहा। प्रयागराज के अलावा कौशांबी, प्रतापगढ़, वाराणसी और भदोही से आए ब्राह्मणों ने विधि-विधान से पूजन किया। दशविध स्नान, ऋषि तर्पण, सूर्योपासना के बाद सभी ने अपने पुराने यज्ञोपवीत का त्याग कर नया जनेऊ धारण किया।
तीर्थ पुरोहित पं.बच्चा गुरु ने बताया कि मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने सबसे पहला यज्ञ दस अश्वमेध यज्ञ इसी दशाश्वमेध घाट पर किया था। तभी से इस घाट का नाम दशाश्वमेध पड़ा। श्रावण मास की पूर्णिमा को ही वेदों की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए इस दिन वेद अध्ययन का संकल्प लिया जाता है। यह केवल जनेऊ बदलने का पर्व नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और अपनी जड़ों से जुड़ने का पर्व है।
उन्होंने बताया कि श्रावणी उपाकर्म पर गंगा तट पर किया गया प्रायश्चित कई गुना फलदायी होता है। विप्रों ने विश्व कल्याण, देश में सुख-शांति और सनातन धर्म की रक्षा के लिए हवन-पूजन भी किया। इस दौरान पूरा घाट “हर हर गंगे” और गायत्री मंत्र से गुंजायमान रहा।इस अवसर पर पंडित मनीष पालीवाल,रोचक त्रिपाठी सहित सैकड़ों विप्रों ने लोक कल्याण की कामना से यज्ञ में आहुतिया डाली ।
