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स्त्री-विमर्श और मानवीय करुणा की गहराई’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

स्त्री-विमर्श और मानवीय करुणा की गहराई’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन 

हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में 11 सितम्बर 2026, शुक्रवार, अपराह्न 3ः00 बजे एकेडेमी स्थित गाँधी सभागार में महादेवी वर्मा की पूण्यतिथ के अवसर पर ‘महादेवी वर्मा के गद्य में भारतीय दर्शन, स्त्री-विमर्श और मानवीय करुणा की गहराई’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती जी की प्रतिमा एवं महादेवी वर्मा के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रारम्भ में एकेडेमी के सचिव डाॅ. अजीत कुमार सिंह एवं कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने आमंत्रित अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शाॅल देकर किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए डाॅ. अजीत कुमार सिंह ने कहा कि ‘महादेवी वर्मा के साहित्य में सभी प्रसंग विद्यमान है चाहें वो प्रेम हो, करूणा हो या वियोग। उन्हाने अपने साहित्य के माध्यम से नारी को केन्द्र में रखा और उसकी व्यथा को समाज के सम्मुख रखा किया। उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। महादेवी वर्मा जी वर्ष 1943 में हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़ी और लगभग 18 वर्षों तक एकेडेमी के विभिन्न दायित्वों पर रह कर कार्य किया। ’संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डाॅ. ऊषा मिश्रा, पूर्व विभागाध्यक्ष – हिन्दी, प्रयाग महिला विद्यापीठ, प्रयागराज ने कहा कि ‘महादेवी का साहित्य नारी के प्रश्नों को बहुत गम्भीरता से उभारता है। उनका मानना था कि स्त्री को केवल त्याग, सहनशीलता की प्रतिमूर्ति मानना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने व्यक्तित्व एवं अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए। वे स्त्रियों की शिक्षा, समानता, संवेदना और आत्मनिर्भरता पर बल देती हैं। महादेवी जी – जिनकी प्रासंगिकता समय के साथ कम नहीं होती, महादेवी जी को समझना भारतीय स्त्री की चेतना, संघर्ष और आत्मसम्मान की यात्रा को समझना है। वो स्त्री ही नहीं वरन् आस पास के जीवन को अधिक संवेदनशील दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती हैं।’ संगोष्ठी की मुख्य वक्ता प्रो. सरोज सिंह, विभागाध्यक्ष – हिन्दी, सी.एम.पी. डिग्री काॅलेज, प्रयागराज ने कहा कि ‘महादेवी वर्मा का चिन्तन और साहित्य निरन्तरता और सनातनता, तथा व्यापकता और पूर्णता से परिपूर्ण है। महादेवी जी के गद्य में भारतीय दर्शन की गहरी अन्तर्दृष्टि विद्यमान है, जहाँ उनके काव्य में रहस्यवाद और अद्वैतवाद की आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हैं, वहीं उनके गद्य साहित्य में भारतीय दर्शन का व्यवहारिक और मानवतावादी रूप परिलक्षित होता है। बौद्ध दर्शन का ‘करुणा’ और ‘दुःखवाद’ उनके रेखाचित्रों और संस्मरणों का मूल आधार है। महादेवी के पाठ की विशेषता है कि वह स्वयं में संपूर्ण होता है। पाठ में ही सारी दुनिया होती है। महादेवी के पाठ में स्त्री सिर्फ स्त्री के रूप में ही नहीं आती, बल्कि संस्थान के रूप में सामाजिक और राजनीतिक प्राणी के रूप में अभिव्यक्त होती है। महादेवी जी ने स्त्री विमर्श को नया आयाम और विचार ही नहीं दिया, बल्कि नई भाषा भी दी है। ।’ संगोष्ठी की विशिष्ट वक्ता डाॅ. रतन कुमारी वर्मा, विभागाध्यक्ष – हिन्दी, जगत तारन गल्र्स डिग्री काॅलेज, प्रयागराज ने ‘महादेवी वर्मा के गद्य में भारतीय दर्शन, स्त्री-विमर्श और मानवीय करुणा की गहराई’ विषय पर डालते हुए कहा ‘महादेवी वर्मा के गद्य साहित्य में भारतीय दर्शन, स्त्री विमर्श और मानवीय करुणा की गहराई सर्वत्र व्याप्त है। ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ भारतीय नारी की समस्याओं का जीवंत दस्तावेज है, जो कि लगभग 85 वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था 1942 में, परन्तु वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है। भारतीय नारी के जीवन की विभिन्न समस्याओं का ग्यारह अध्याय में बड़ी ही सूक्ष्म विवेचन एवं विश्लेषण किया गया है। नारी परम्परा एवं रूढ़ियों की अदृश्य दीवारों में कैद है। उसे या तो देवी के रूप में स्थापित किया जाता है या तो दासी के रूप में रखा जाता है लेकिन उसके साथ मानवतापूर्ण व्यवहार नहीं किया जाता है। उसे मानवी समझे जाने की जरूरत है। मानवी समझे जाने के लिए नारी को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्वाधीनता की आवश्यकता है। नारी की दृष्टि से उसकी मौलिकता को स्वीकार करने की आवश्यकता है। उसे पुरुष की छाया मात्र न समझकर उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को भारतीय समाज के द्वारा प्रश्रय दिया जाना चाहिए। तभी समाज, परिवार, राष्ट्र को मजबूत करने में वह अपना अमूल्य योगदान दे सकती है और अपने व्यक्तित्व के साथ सम्मान से गौरवान्वित जीवन जी सकती है।’ कार्यक्रम का संचालन करते हुए डाॅ. मुदिता तिवारी सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, आर्य कन्या डिग्री काॅलेज, प्रयागराज ने कहा कि ‘महादेवी वर्मा का कहना था कि जिस युग का मानव अपने से पूर्व युग के समस्त सत्य ,शिव और आंशिक सत्य को अनुपयोगी बता देता है ,वह अपना विकास अवरुद्ध कर लेता है । आधुनिक मानव भी अपने संस्कारों के लिए आदिम पूर्वज का आभारी है।’ कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद ज्ञापन एकेडेमी के प्रशासनिक अधिकारी रतन पाण्डेय ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में पं0 रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’, डॉ अरुण मिश्रा, सुनील दानिश, गोपाल जी पाण्डेय, विवेक सत्यांशु, एम. एस. खान. डाॅ. अनिल कुमार सिंह, सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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