भारतीय राजनीति में उभरता फूफावाद
मुंबई श्रीकेश चौबे:-
भारतीय राजनीति में नेताओं का लोगों से पारिवारिक रिश्ता बनाना और जनता द्वारा उन्हें किसी पसंदीदा नाते के साथ सम्बोधित करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन प्रधानंमत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में ‘नाराज फूफाजी’ के रिश्ते को जिन सियासी रिश्तों के संदर्भ में नए सिरे पारिभाषित किया है, वह सामाजिक रिश्तों की राजनीतिक ब्रांडिंग ज्यादा है।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक रिश्तों और रिवाजों में ‘नाराज फुफा’ को मनाने और यथासंभव उसका मान रखने की जिम्मेदारी भी परिवारजनों की ही होती है, जबकि राजनीतिक फूफा को मनाना तो दूर, उसे गरियाते रहना ही सियासत मानी जाती है। कपड़े फाड़ते रहना ही राजनीतिक फूफा की नियति है।
बल्कि यूं कहें कि राजनीतिक फूफा का सतत रूठे रहना ही कई बार प्रतिस्पर्धी पार्टी की सियासी संजीवनी बन जाता है। इस सियासी बतकही में बेचारी जनता इस फुफाबाद के मजे लेती है।
भारतीय जनता अपने कई प्रिय और प्रभावशाली नेताओ को पारिवारिक रिश्तों से संबोधित करती आई है। मसलन महात्मा गांधी अगर ‘बाबा’ थे तो जवाहरलाल नेहरू बच्चों के ‘चाचा’ कहलाना पसंद करते थे। आज के जमाने की बात करें तो शिवराजसिंह चौहान ‘मामा’ हैं तो सुश्री मायावती ‘बहनजी’ या फिर ‘बुआजी’ हैं। अखिलेश यादव ‘बबुआ’ या भतीजे हैं तो ममता बनर्जी ‘दीदी’ कहलाना पसंद करती हैं। देवेन्द्र फडणवीस ‘देवा भाऊ’ कहलाते हैं। वैसे भी अधिकांश युवा नेता उनके समर्थकों के लिए ‘भैया’ ही होते है। दरअसल यह भारतीय मानस है, जो राजनीतिक हायरआर्की में भी कोई न कोई सामाजिक रिश्ता खोज लेता है।
इस मायने में विपक्ष को ‘नाराज फुफा’ करार देना थोड़ा अलग इसलिए है क्योंकि भारतीय परिवारों में ‘फूफा’ का रिश्ता करीबी और महत्वपूर्ण होते हुए भी बहुत सम्मान के भाव से नहीं देखा जाता। उत्तर पश्चिमी भारत में फूफा
(कहीं फुआ भी) पिता की बहन (बुआ) के पति को कहा जाता है। कुछ राज्यों में बुआ के लिए ‘फूफी’ भी प्रचलन में है।
तो फिर ‘फूफा’ शब्द आया कहां से? इसके मूल में जाएं तो जानकारी मिलती है कि इसकी उत्पत्ति प्राकृत भाषा के शब्द ‘फुप्फु’ से हुई है। इसीका स्त्रीलिंगी रूप ‘फुप्फी’ है। संस्कृत में बुआ को ‘पितृस्वसा’ कहा जाता है, ‘बुआ’ शब्द संभवतः इसी का अपभ्रंश है। ‘स्वसा’ का अर्थ बहन या भगिनी है।
हमारे लिए गर्व की बात यह है कि इतने सारे पारिवारिक रिश्ते और उनके अलग-अलग सम्बोधन और पहचान केवल भारतीय परंपरा में ही है। अन्य संस्कृतियों और सभ्यतााओ में सगे रिश्तों को छोड़ दे तो चचेरे ममेरे या फुफेरे रिश्तों की न तो खास अहमियत है और न ही उनके अलग-अलग नामकरण हैं। वहां बाकी सब ‘इन लॉ’ होते हैं।
लेकिन ‘फुफा’ शब्द से एक करीबी रिश्ता ही प्रतिध्वनित नहीं होता, उसके साथ नाराजी और जबरिया ध्यानाकर्षण के आग्रह का भाव भी स्वतः नत्थी है। इसीलिए कुछ लोग फूफा को ‘रिटायर्ड जीजा’ भी कहते हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में यह शब्द भी चल निकले।
शादी-ब्याह जैसे बड़े पारिवारिक आयोजनो में भी उसका रूतबा पहले की माफिक नहीं रहा। कहा तो यहां तक जाता है कि मांगलिक अवसर पर भी जो मुंह फुलाकर न बैठे, वह फूफा ही क्या? हर बात में कमियां ढूंढना मानो उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।
बहरहाल राजनीतिक फूफा की बात करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार नाराज फूफा (उनकी अपनी पार्टी में भी कुछ नाराज फूफा हैं) का जिक्र वडोदरा में आयोजित ‘नमो फॉर विकसित भारत’ कार्यक्रम में पहली बार किया। इसके पहले वह विपक्ष पर ‘दिमागी नक्सल’ कहकर प्रहार कर चुके थे। लेकिन बाद में शायद उन्हें लगा कि नाराज और आलोचक विपक्ष के लिए कुछ ऐसा शब्द खोजा जाए, जिसका अर्थ और भाव साधारण आदमी भी बिना दिमाग पर जोर डाले समझ सके। क्योंकि दिमागी नक्सल को बूझने में तो फिर भी दिमाग खपाना पड़ता था।
वडोदरा के बाद प्रधानमंत्री ने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के आयोजन में भी ‘नाराज फूफा’ का खासतौर पर जिक्र किया। उन्होनें विपक्ष, खासकर कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि समाज में ‘कुछ’ लोग ऐसे होते हैं, जो हर नए विकास कार्य या उपलब्धि पर हमेशा असंतुष्ट रहते हैं और बिला वजह उसका विरोध करते हुए पूछते हैं कि इसकी क्या जरूरत थी?
श्री मोदी ने वडोदरा में मालगाड़ियों (फ्रेट कॉरिडोर) और डबल-स्टैक कंटेनर के जरिए एक बार में सैकड़ों ट्रकों के बराबर माल ढोने का उदाहरण देते हुए कहा कि अब ये ‘नाराज फूफाजी’ चिल्लाएंगे कि जब रेल कॉरिडोर बन गया तो रोड पर चलने वाले ट्रक चालकों और मालिकों का क्या होगा?
इससे तिलमिलाई कांग्रेस ने पलटवार किया कि मोदी सरकार अपनी नाकामियों और जनविरोधी नीतियों को छिपाने के लिए ऐसे नए-नए शब्दों और विशेषणों (जैसे ‘नाराज फूफा’, ‘दिमागी नक्सल’ का इस्तेमाल करती है।
माना यह भी जा रहा है कि प्रधानमंत्री जेन जी से कनेक्ट होने के लिए नए शब्द उपयोग में ला रहे हैं. लेकिन यहां फर्क यह है कि जेन जी के शब्दकोश में फूफा जैसे शब्दों की कोई जगह नहीं है। आम तौर पर उसके लिए सभी ‘अंकल’ ही हैं।
खैर, प्रधानमंत्री ने अब ‘राजनीतिक फूफा बनाम पारिवारिक फुफा’ का एक नया नरेटिव उछाला है। विपक्षी दल भी खुद को राजनीतिक फूफा की श्रेणी में ही मान रहे हैं। लेकिन इसमें खतरा यह है कि अगर पारिवारिक मामलों में भी फूफा की यही परिभाषा अप्लाई की जाने लगे तो रिश्तों और रिवाजों को कायम रखने में बहुत मुश्किल होगी।
रूठे पारिवारिक फूफा को तो किसी भी तरह से मनाने की की गुंजाइश रहती है। लेकिन सियासी दल तो ‘नाराज फुफा’ का किरदार तो अलग अलग समय और परिस्थिति के अनुसार निभाते रहते हैं। वैसे इस ‘फूफा समस्या’ का तोड़ यही है कि राजनीतिक रिश्तों में भी सतत संवाद की गुंजाइश बनी रहे। भावनात्मक दृष्टि से फूफाओ का जिंदा रहना लोकतंत्र में अच्छी बात नहीं है।
