आस्था समिति की नाट्य प्रस्तुति
*‘पाकिटमार रंगमंडल’ ने दिखाई समाज की हकीकत*

प्रयागराज।* हम अक्सर कहते हैं कि किसी अपराधी को सुधारने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने अतीत को पीछे छोड़कर नई जिंदगी शुरू करने का प्रयास करता है तो वही समाज बार-बार उसके पुराने अपराध की याद दिलाकर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता है। इसी संवेदनशील और विचारोत्तेजक प्रश्न को केंद्र में रखकर असगर वजाहत ने ‘पाकिटमार रंगमंडल’ नाटक की रचना की है। आस्था समिति की ओर से इस नाटक का मंचन गुरुवार को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में शरद कुशवाहा के निर्देशन में किया गया।
संस्था के महासचिव मनोज गुप्ता ने बताया कि नाटक की कहानी एक ऐसे नवयुवक के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो शुरुआत में जेबकतरा है। जेब काटना ही उसका पेशा है और इसी से वह अपना जीवन चलाता है। लेकिन एक दिन वह एक नाटक देखता है। नाटक का प्रभाव उसके मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा पड़ता है कि उसके भीतर परिवर्तन की शुरुआत होती है। वह अपराध की दुनिया छोड़कर रंगमंच को अपना लेता है और एक नाट्य मंडली का गठन करता है, जिसका नाम वह ‘पाकिटमार रंगमंडल’ रखता है।
नाटक यह दिखाने का प्रयास करता है कि समाज एक ओर अपराधी को सुधारने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर उसके सुधरने के बाद भी उसके अतीत को बार-बार सामने लाकर उसे स्वीकार नहीं करता।
नाटक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसमें किसी भाषण या उपदेश के माध्यम से परिवर्तन की बात नहीं कही गई, बल्कि कला और रंगमंच के अनुभव को परिवर्तन का माध्यम बनाया गया। एक नाटक देखने वाला जेबकतरा स्वयं रंगमंच का हिस्सा बन जाता है। उसके लिए रंगमंच महज मनोरंजन नहीं रह जाता, बल्कि उसके जीवन को नई दिशा देने का माध्यम बन जाता है।
नाटक के माध्यम से यह संदेश भी उभरकर सामने आया कि रंगमंच केवल मंच पर कहानी कहने की कला नहीं है, बल्कि वह व्यक्ति और समाज दोनों को आईना दिखाने तथा बदलाव की चेतना पैदा करने की शक्ति रखता है।
नाटक का अंत व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करते हुए दर्शकों के सामने एक गंभीर प्रश्न छोड़ जाता है। जो व्यक्ति दूसरों की जेब काटता है, उसे हम ‘पाकिटमार’ कहते हैं, लेकिन जो व्यवस्था मजबूरी, स्वार्थ और लालच के नाम पर कला और कलाकारों की जेब काटती है, उसके लिए हमारे पास क्या नाम है?
नाटक में भगवान की भूमिका में हर्षराज पाल, मुन्ना त्यागी की भूमिका में ऋतिक श्रीवास्तव, आबदा की भूमिका में ‘शालिनी मिश्रा, नसरीन की भूमिका में दिव्या ‘शुक्ला ने अपने सशक्त अभिनय की छाप दर्शकों पर छोड़ी। साथ ही आयुष केसरवानी, मो0 आबिद, सत्यम राय, अजय कुमार आदित्य कुमार सिंह, वंशिका गिरी का अभिनय भी सराहनीय था। प्रकाश परिकल्पना प्रस्युष वर्सने (रिशु), संगीत संचालन आदित्य कुमार सिंह, रूप सज्जा मो0 हामिद, सेट परिकल्पना आरिश जमील, पोस्टर, ब्रोशर डिजाईन ‘शहबाज़ अहमद ने की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ‘शहर उत्तरी के विधायक ईं0 हर्षवर्धन बाजपेयी ने कहा कि रंगमंच समाज को जोड़ने और सामाजिक विसंगतियों पर सवाल उठाने का सशक्त माध्यम है। ‘पाकिटमार रंगमंडल’ जैसे नाटक यह बताते हैं कि कला केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि व्यक्ति के भीतर बदलाव की संभावना भी पैदा करती है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. विभा मिश्रा, सहायक निदेशक, सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार ने कहा कि रंगमंच समाज में संवाद स्थापित करने का प्रभावशाली माध्यम है। इस नाटक की विशेषता यह है कि इसमें व्यक्ति के परिवर्तन और समाज की स्वीकार्यता के बीच के द्वंद्व को बहुत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वरिष्ठ चित्रकार एवं रंगकर्मी अजामिल व्यास ने कहा कि रंगमंच की वास्तविक ताकत उसके जीवंत संवाद और मानवीय संवेदनाओं में है। ‘पाकिटमार रंगमंडल’ यह साबित करता है कि कला किसी भी व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन की चिंगारी पैदा कर सकती है।
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एवं वरिष्ठ लोक नाट्यविध अतुल यदुवंशी ने कहा कि भारतीय रंगपरंपरा हमेशा से समाज को दिशा देने का काम करती रही है। आज आवश्यकता है कि रंगमंच मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को भी अपनी प्रस्तुतियों का केंद्र बनाए। ‘पाकिटमार रंगमंडल’ इसी परंपरा को आगे बढ़ाने वाला सार्थक प्रयास है।
वरिष्ठ नाट्य निर्देशक शैलेश श्रीवास्तव ने कहा कि किसी भी नाटक की सफलता केवल उसके मंचन में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह दर्शकों के मन में कितनी देर तक बना रहता है।
कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत संस्था के महासचिव मनोज कुमार गुप्ता ने किया। कार्यक्रम के संयोजक पंकज गौड़ रहे। कार्यक्रम के अंत में संस्था के अध्यक्ष बृजराज तिवारी एवं उपाध्यक्ष अनूप गुप्ता ने अतिथियों, कलाकारों एवं दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। मंच संचालय रंगकर्मी अभिजीत मिश्रा ने किया। विशेष सहयोग शहर के वरिष्ठ समाजसेवी एवं रंगकर्मी जमील अहमद का रहा l
