एसआईआर के चपेट में दिग्गज भी
मुंबई श्रीकेश चौबे:-
देश में चल रहे स्पेशल इंटेसिव रिवीजन यानी एसआईआर प्रक्रिया की शुरुआत से ही तमाम तरह के विवाद जुड़े रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आनन-फानन में शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों से लेकर प्रभावित लोगों ने तमाम सवाल उठ्खये। फिर पश्चिम बंगाल में भी कई विवाद सामने आए। जब विवाद बढ़ा तो देश की शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप किया। पश्चिम बंगाल में अभी मामला ठंडा पड़ा भी न था कि देश की नामचीन हस्तियों के वोटर रिकॉर्ड में कथित विसंगतियों के चलते नोटिस दिये जाने के बाद विवाद नये सिरे से सामने आया है। जिन लोगों को चुनाव आयोग के अधिकारियों की तरफ से नोटिस भेजे गए हैं, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री एल. के. आडवाणी, विदेश मंत्री एस जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता व आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं। सबसे अजीब बात तो यह है कि चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू को भी इस प्रक्रिया के तहत नोटिस भेजा गया है। जबकि इस प्रक्रिया को खुद भारतीय निर्वाचन आयोग चला रहा है। एसआईआर की जटिल प्रक्रिया की कसौटी पर देश के जागरूक व दिग्गज नेता ही खरे नहीं उतर रहे हैं तो आम आदमी की क्या बिसात? ऐसे में सामान्य लोगों को अपनी दावेदारी के लिये कागजात जुटाने में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा होगा, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। यह प्रक्रिया कितनी जटिल हो चली है, वह इस बात से पता चलता है कि मात्र दिल्ली में ही 33 लाख से ज्यादा लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं। ये नोटिस विशेष रूप से उन मामलों में जारी किए गए हैं जहां वोटरों को वर्ष 2002 के गहन संशोधन से नहीं जोड़ा जा सका है। दरअसल, एसआईआर प्रक्रिया में 2002 के गहन संशोधन से जोड़ने का प्रावधान बाद में शामिल किया गया। इस व्यवधान की वजह यह है है कि नौकरी व शहर बदलने वाले बहुत सारे लोग दो दशक से अधिक समय का पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं रख पाते। जब
हालांकि, नया विवाद सामने आने के बाद चुनाव आयोग और दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी ने इस बात पर बल दिया है कि एसआईआर की प्रक्रिया में नोटिस मिलने का मतलब यह नहीं है कि वोट काटा जायेगा। आश्वासन दिया जा रहा है कि
वोटरों को दस्तावेज जमा करने और जवाब देने का पर्याप्त मौका दिया जाएगा। साथ यह भी कि अंतिम फैसला उचित प्रक्रिया के प्रावधानों के तहत ही लिया जायेगा। निश्चित रूप से यह सुरक्षा आश्वासन बेहद जरूरी है क्योंकि प्रक्रिया में शामिल न हो सकने वाले वोटर तमाम तरह की आशंकाओं से जूझ रहे हैं। इसमें दो राय नहीं है कि वोटर लिस्ट को समय-समय पर अपडेट किया ही जाना चाहिए। जिससे वोटरों के दोहराव, अयोग्य व मृत वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकें। लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि कोई योग्य नागरिक वोटर लिस्ट से बाहर न रह जाये। निस्संदेह, ये दोनों ही मकसद समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, दिवंगत अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय का नाम उन लोगों की सूची में आना, जिनका डेटा पिछले एसआईआर से जुड़ नहीं पाया था, यह दिखाता है कि डेटाबेस आधारित प्रक्रियाओं में कितनी
विसंगतियां हो सकती हैं। इस तरह पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सामने आई जटिलताएं व्यवस्था की विसंगतियों का सटीक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, हो सकता है कि वे एक दशक से अधिक समय तक बोट न दे पाएं। ऐसे मामलों के निपटारे की मौजूदा रफ्तार को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल को उनकी अपीलों पर फैसला लेने में बारह साल से अधिक का समय लग सकता है। इससे पूरे देश के लिये यह सीख मिलती है कि हर योग्य वोटर को, अब चाहे वह विशिष्ट व्यक्ति हो या आम नागरिक-वोटर लिस्ट में बने रहने का उचित अवसर मिलना चाहिए। इस पूरी कवायद की विश्वसनीयता बनाये रखने के लिये एक पारदर्शी और समीक्षा योग्य प्रक्रिया की जरूरत है।
