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जिन लाहौर नहीं देख्या नाटक में जीवंत हुई विभाजन की मानवीय संवेदना

जिन लाहौर नहीं देख्या नाटक में जीवंत हुई विभाजन की मानवीय संवेदना

प्रयागराज।* एकता संस्था द्वारा प्रसिद्ध नाटककार असगर वजाहत द्वारा लिखित बहुचर्चित नाटक जिन लाहौर नहीं देख्या वो जनम्या ही नहीं का मंचन आज ब्लू बेल स्कूल के सभागार में किया गया।युवा रंगकर्मी पंकज गौड़ के सधे हुये निर्देशन में प्रस्तुत नाटक ने भारत पाकिस्तान विभाजन के दर्द , सांप्रदायिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों की गहराई को मंच पर सजीव कर दिया।
संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश के सहयोग से मंचित नाटक 1947 में भारत पाकिस्तान विभाजन के दौर पर आधारित है।नाटक के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि राजनीतिक सरहदें जमीन को तो बांट सकती है लेकिन इंसानी दिलों ,सांझी संस्कृति और मोहब्बत को नहीं। विभाजन के बाद भारत से अपना सब कुछ छोड़कर लाहौर पाकिस्तान गये मिर्ज़ा परिवार को लाहौर में एक बड़ी हवेली दी जाती है।यह हवेली रतन चंद नाम के एक हिंदू परिवार की होती है।रतन चंद की एक बूढ़ी मां होती है जिसको सब माई कहकर पुकारते थे ।दंगे और भय के माहौल में रतन चंद भारत भाग जाता है।लेकिन उसकी बूढ़ी माई अपनी जन्मभूमि ,हवेली और लाहौर से जुड़ी यादों को छोड़कर जाने से इंकार कर देती है।
जब मिर्ज़ा परिवार हवेली में पहुंचता है तो वहां एक हिंदू माई को देखकर हैरान हो जाते है।शुरू में वह लोग माई से सही से बात भी नहीं करते किंतु माई के प्यार दुलार और अपनत्व से मिर्ज़ा परिवार का दिल जीत लेती है।मिर्ज़ा परिवार माई को अपनी माँ के समान आदर और सम्मान देने लगा था। कहानी में मोड़ तब आता है जब कुछ स्थानीय कट्टरपंथी उस हवेली पर कब्जा करने की नीयत से माई को शहर से बाहर निकालने का प्रयास करते है।लेकिन मिर्ज़ा परिवार ,दर्जी और मौलवी साहब माई की रक्षा में ढाल बनकर सामने खड़े हो जाते है।
अंत में माई के निधन के बाद नाटक काफी मार्मिक हो जाता है।कट्टरपंथी माई का अंतिम संस्कार लाहौर में करने का विरोध करते हैं।किंतु मौलवी साहब और मिर्ज़ा परिवार पूरी संजीदगी के साथ खड़े होते हैं।वो कहते हैं माई सिर्फ हिंदू नहीं बल्कि लाहौर की रूह थी।अंत में बात सबकी समझ में आ जाती है और सब मिलकर माई का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ कर देते है।
निर्देशक पंकज गौड़ ने पत्रों के मानसिक द्वंद्व और भावनात्मक उतार चढ़ाव को बहुत ही कुशलता से उभारा।संगीत संयोजन और प्रकाश व्यवस्था ने नाटक को प्रभावशाली बनाया। रतनचंद की भूमिका में विक्रांत केसरवानी, सिकंदर मिर्ज़ा की भूमिका में हर्शल राज, माई की भूमिका में प्रिया मिश्रा, मिजाईंन की भूमिका में शीला कुमारी, नासिर की भूमिका में शरद कुशवाहा, तन्नू की भूमिका में शालिनी मिश्रा, मौलवी की भूमिका में पंकज गौड़ ने अपने अभिनय से दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।प्रकाश व्यवस्था रिशु,संगीत संयोजन आदित्य सिंह, रूप सज्जा मो. हामिद, सेट निर्माण हर्षल राज, संदीप सिंह का था।
अतिथियों का स्वागत संस्था के महासचिव जमील अहमद, उपाध्यक्ष मनीष अग्रवाल, कोषाध्यक्ष अंजू यादव ने किया।धन्यवाद ज्ञापित संस्था के अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने किया।

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