आस्था और विश्वास का शहर
“मेरा प्रयागराज”

लेखिका जूही श्रीवास्तव
जिसके कण कण में होता संगम का आभास है ये शहर इलाहाबाद नही ….
” ये तीर्थराज प्रयागराज है।”
इतिहास को अपनी मिट्टी में समेटे
गंगा जमुनी तहजीब को ज़िंदा किये जी रहा है
ये तीर्थराज प्रयागराज है ।
ये गंगा जमुना का पावन संगम है
कला ,संस्कृतियों का अदभुत संगम है
त्रिवेणी को हृदय में बसाये जी रहा है ।
ये तीर्थराज प्रयागराज है ।
जहां की संस्कृति में प्रेम और भाईचारा है
ये साहित्य और शिक्षा का गलियारा है ।
जीवन के अंतिम समय का सहारा है ।
ये तीर्थराज हमारा है ।
अमृत के स्नान का हो रहा आगाज है ।
माघ के रंग में रंगने जा रहा प्रयागराज है
नर ,नारी ,साधु संत और पंडो का मेला
“जय हो गंगा मैया ” के जयघोष के साथ होगा “खिचड़ी” का मेला
आस्था की डुबकी लगाएगा संगम
आहा!! दृश्य होगा कितना विहंगम
तंबुओं की होंगी लंबी लंबी कतारें
नागाओ ,किंनर ,महंतो के अखाड़े
ठंड के जोर का सबसे विकट महीना ..गंगा किनारे
फिर उतर रहा है माघ का महीना
गंगा की सौंधी खुश्बू होगी आत्मसात
लोक और परलोक तरेंगे साथ साथ
पतित पावनी गंगा का मिलेगा आशीर्वाद
जन्म सफल ,जीवन सफल ,रहे अचल अहिवात ।
“तीर्थो का राजा ,यज्ञ का आगाज़ हूं इलाहाबाद नही ,
“अब मैं सनातन प्रयागराज हूं ।”
