मेहनत को सम्मान दिलाने की मुहिम

लेख… निलय शुक्ला
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में अवसर समान होने चाहिए। परंतु वास्तविकता यह है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में, जहाँ अधिकांश आबादी मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग से आती है, भ्रष्टाचार सबसे अधिक अन्याय पैदा करता है। यहाँ संघर्ष ही जीवन है – और जब उसी संघर्ष के बीच “पैसे से सिस्टम” चलने लगे, तो ईमानदार लोग पीछे छूट जाते हैं।
उत्तर प्रदेश में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। वे दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार की उम्मीदों का भार उठाते हैं। पर जब नियुक्तियों में अनियमितता, पेपर लीक, या पैसे के बल पर चयन की खबरें सामने आती हैं, तो सबसे बड़ा आघात उन्हीं पर पड़ता है। एक गरीब या मध्यम वर्गीय परिवार का बच्चा, जो केवल अपनी योग्यता पर निर्भर है, वह कैसे मुकाबला करे उस व्यक्ति से जो पैसे देकर रास्ता बना लेता है?
भ्रष्टाचार केवल एक लेन-देन नहीं है; यह अवसरों की चोरी है। जब कोई व्यक्ति पैसे देकर नौकरी, ठेका या पद हासिल करता है, तो वह किसी योग्य उम्मीदवार का हक छीनता है। इसका परिणाम यह होता है कि प्रतिभा हतोत्साहित होती है और निराशा बढ़ती है। समाज में यह संदेश जाता है कि मेहनत नहीं, बल्कि “पहुंच और पैसा” ही सफलता की कुंजी है।
मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए हर अवसर जीवन बदलने वाला होता है। एक सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान, स्थिरता और पूरे परिवार के भविष्य की सुरक्षा होती है। ऐसे में यदि चयन प्रक्रिया पर विश्वास कमजोर पड़ जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत हानि नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन का कारण बनता है।
हालांकि, इस अंधकार के बीच सकारात्मक प्रयास भी जारी हैं। उत्तर प्रदेश में खुफिया विभाग, सतर्कता विभाग तथा भ्रष्टाचार निरोधक संगठन सक्रिय रूप से संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं और समय-समय पर कार्रवाई कर रहे हैं जो कि भूरि भूरि प्रशंसनीय है। डिजिटल निगरानी, पारदर्शी प्रक्रियाएं और सख्त जांच व्यवस्था से व्यवस्था को स्वच्छ बनाने का प्रयास हो रहा है। साथ ही, आज का युवा वर्ग भी जागरूक है, सोशल मीडिया, जनजागरूकता अभियानों और कानूनी अधिकारों की जानकारी के माध्यम से वह भ्रष्टाचार का खुलकर विरोध कर रहा है। यह संकेत है कि व्यवस्था में सुधार की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं और एक ईमानदार उत्तर प्रदेश का सपना संभव होता दिख रहा है।
