Sunday, October 11Ujala LIve News
Shadow

सदानंद शांताराम म्हात्रे वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

 

सदानंद शांताराम म्हात्रे वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

 


मुंबई श्रीकेश चौबे:-
उपचुनावों में हार का ठीकरा किस पर ?

भारतीय लोकतंत्र का मिजाज अब पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस का चुनावी शिकस्त के बाद का बर्ताव आज भी पुराना और पूरी तरह अनुमानित नजर आता है। इसी माह संपन्न हुए लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के नतीजों ने एक बार फिर कांग्रेस की सांगठनिक कमजोरियों और वैचारिक खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है।4 विधान सभा के उपचुनावों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। असम की प्रतिष्ठित नगांव लोकसभा सीट से लेकर पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और मुस्लिम बहुल रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र, तथा पुदुचेरी की थट्टांचवडी सीट तक हर तरफ कांग्रेस को करारी और अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा है। इस ताजा चुनावी झटके ने राजनीतिक गलियारों में एक गंभीर और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि लगातार मिल रही इन पराजयों के बाद अब कांग्रेस अपनी नाकामी का ठीकरा किस संवैधानिक संस्था, व्यक्ति या व्यवस्था के सिर पर फोड़ेगी?

कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व का यह इतिहास रहा है कि जब भी चुनावी नतीजे उनके विपरीत आते हैं, वे बिना किसी पुख्ता सबूत के देश की संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ उछालना शुरू कर देते हैं। इन उपचुनावों के मतदान से ऐन पहले, दिल्ली की सड़कों पर राहुल गांधी और विपश्च के नेताओं द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किया गया उग्र प्रदर्शन इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। कांग्रेस ने स्पेशल इंटेसिव रिवीजन की आड़ में ‘करोड़ों मतदाताओं के नाम काटे जाने’ और ‘बोट चोरी’ का एक भ्रामक नैरेटिव गढ़ने की पुरजोर कोशिश की, जिसे सुप्रीम कोर्ट के वैधानिक स्पष्टीकरणों और स्वतंत्र जांचों ने पूरी तरह खारिज कर दिया। भारतीय जनता पार्टी का इस पर बेहद कड़ा और तार्किक पक्ष है कि जब कांग्रेस हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक या तेलंगाना में चुनाव जीतती है, तब लोकतांत्रिक प्रक्रिया और निर्वाचन प्रणाली

बिल्कुल पवित्र हो जाती है, लेकिन असम के नगांव या बंगाल के रेजीनगर में जनता जब उन्हें नकार देती है, तो वही व्यवस्था ‘कठपुतली’ नजर आने लगती है। यह दोहरा रवैया केवल देश के करोड़ों मतदाताओं के विवेक का अपमान है।

पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा सीट के चुनावी नतीजे कांग्रेस के पारंपरिक तुष्टिकरण के नैरेटिव पर सबसे बड़ा और सीधा प्रहार हैं। लगभग 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार शंखराब सरकार ने करीब 75,000 से अधिक वोटों के विशाल अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस सीट पर कांग्रेस दूर-दूर तक मुकाबले में भी नजर नहीं आई। रेजीनगर की समझदार जनता ने यह साबित कर दिया है कि अब देश का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी मजहब से ताल्लुक रखता हो, केवल ‘मुफ्त के खोखले वादों’ या ‘डराने की राजनीति’ के बहकावे में आने वाला नहीं है। जनता अब सड़कों के निर्माण, आधुनिक अस्पतालों, बेहतर शिक्षा और औद्योगिक पाकों जैसे बुनियादी विकास को प्राथमिकता दे रही है। काग्रेिस अपनी इस वैचारिक और रणनीतिक हार को अभी भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। जब चुनाव आयोग और ईवीएम पर उठाए गए सवाल जनता के बीच बेअसर साबित होने लगते हैं, तो कांग्रेस अपने तरकश से ‘केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग’ का पुराना तीर निकाल लेती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं का यह लगातार आरोप रहता है कि भाजपा सरकार केंद्रीय अन्वेषणप्रवर्तन निदेशालय का भय दिखाकर विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित करती है और स्वतंत्र रूप से प्रचार नहीं करने देती। भाजपा और राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि कांग्रेस लगातार विक्टिम कार्ड खेलकर अपनी आंतरिक कमजोरियों, नेतृत्वहीनता और दिशाहीन नीति को छिपाने का प्रयास करती है, लेकिन देश की जागरूक जनता अब इस राजनीतिक ड्रामे के पीछे की असलियत को बहुत अच्छी तरह समझ चुकी है।

इन उपचुनावों के नतीजों ने न केवल कांग्रेस की सांगठनिक अक्षमता को उजागर किया है, बल्कि विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर की गहरी दरारों को भी सरेआम कर दिया है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम द्वारा कांग्रेस की रणनीतियों पर सरेआम सवाल उठाना और राहुल गांधी के आंदोलन से खुद को दूर रखना यह साफ करता है कि क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस के बोझ को ढोने के मूड में नहीं हैं। पुदुचेरी की थट्टांचवडी सीट पर कांग्रेस की करारी हार ने यह साबित कर दिया है कि दक्षिण भारत में भी उसकी पकड़ लगातार ढीली हो रही है। क्षेत्रीय दलों को अब यह भली-भांति समझ आ गया है कि कांग्रेस के पास न तो कोई स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टिकोण है और ना ही भाजपा के मजबूत विकासवादी नैरेटिव का कोई व्यावहारिक तोड़। शीर्ष स्तर पर खुद को विपश्व का इकलौता चेहरा साबित करने की राहुल गांधी की होड़ ने गठबंधन के

अन्य मजबूत सहयोगियों के भीतर एक गंभीर असुरक्षा और असंतोष की भावना पैदा कर दी है, जिसका सीधा चुनावी नुकसान जमीन पर देखने को मिल रहा है। अक्टूबर 2026 के ये उपचुनाव कांग्रेस के लिए महज एक चुनावी हार नहीं हैं, बल्कि एक गंभीर और निर्णायक चेतावनी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा- एनडीए का ‘विकसित भारत’ का संकल्प, बुनियादी ढांचे का तीव्र विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूत नीतियां देश के मतदाताओं के दिलों में गहरा विश्वास पैदा कर चुकी हैं। जनता अब खोखली बयानबाजी, संसद से सड़क तक के ड्रामे और संवैधानिक संस्थाओं पर किए जाने वाले निराधार हमलों से पूरी तरह ऊब चुकी है। कांग्रेस को अब यह समझना ही होगा कि चुनाव सोशल मीडिया के नैरेटिव या विदेशी दौरों पर दिए गए बयानों से नहीं, बल्कि देश के आम नागरिकों के सुख-दुख में उनके साथ खड़े होने और जमीनी स्तर पर कड़ा संघर्ष करने से जीते जाते हैं। अगर कांग्रेस अब भी अपनी हर वैधानिक हार का ठीकरा चुनाव आयोग, ईवीएम, केंद्रीय एजेंसियों या परिस्थितियों पर फोड़ती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय राजनीति के मुख्य पटल से उसका अस्तित्व पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगा। समय की मांग है कि कांग्रेस बहानों की राजनीति को छोड़कर एक जिम्मेदार और रचनात्मक विपश्व की भूमिका निभाना सीखे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *