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सरोकार संस्था ने आयोजित किया प्रोफेसर ओ पी मालवीय स्मृति सम्मान

सरोकार संस्था ने आयोजित किया प्रोफेसर ओ पी मालवीय स्मृति सम्मान

सरोकार संस्था द्वारा प्रोफेसर ओ पी मालवीय एवं भारती मालवीय स्मृति सम्मान २०२२ का आयोजन हिंदुस्तानी अकैडमी सभागार में आयोजित किया गया. इस वर्ष यह सम्मान वरिष्ठ कथाकार श्री हरि चरण प्रकाश को दिया गया है। इस पुरस्कार के अन्तर्गत पच्चीस हज़ार रुपय, अंग वस्त्रम एवं स्मृति चिन्ह दिया जाता है।
कार्यक्रम का प्रारम्भ वरिष्ठ समाज सेवी श्री आनंद मालवीय द्वारा स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने प्रोफ़ेसर मालवीय के जीवन वृत्त पर भी संक्षिप्त प्रकाश डाला। इसके उपरांत कार्यक्रम के प्रथम सत्र में पूरस्कृत रचनाकार हरि चरण प्रकाश के कथा साहित्य पर केंद्रित गोष्ठी का आयोजन हुआ।गोष्ठी में बोलते हुए प्रफ़ेसर राजकुमार ने हरि चरण प्रकाश के कथा साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे एक विशिष्ट तरह के लेखक है। पाठक उन्हें कहानीकारों की भीड़ में अलग से पहचान सकते हैं क्योंकि उनके पास अपनी विशिष्ट भाषा है। वे हल्क़े फुलके अन्दाज़ में गम्भीर बात कह जाते है। इस क्रम में उन्होंने हरि चरण जी की कहनी गृहस्थि का रेजिस्टर का विशेष उल्लेक़ क़िया। उन्होंने आगे कहा की यह हिंदी जगत दुर्भाग्य है कि जो सम्मान और प्रतिष्ठा हरि चरण जी को मिल जाना चाहिये था वह। अब मिल रहा है।
इसी क्रम को आगे बढ़ते हुए वरिष्ठ कथाकार शिव मूर्ति ने कहा कि रचनाकार का आनंद तो रचना में ही है इसलिए जल्दी पहचाना जाना या देर से पहचान जाना ज़्यादा मायने नहीं रखता। उन्होंने ज़ोर दे कर कहा कि हरि चरण प्रकाश दूरदृष्टा कहानी कर है।
अपने आत्म कथ्य में सम्मानित लेखक हरि चरण प्रकाश जी ने कहा की उन्होंने महाकव्यो से प्रेरणा पाई है चाहे वे भारतीय हो, रोमन हो, या ग्रीक। इस सन्दरब में उन्होंने महाभारत का विशेष उल्लेख किया। अंत में उन्होंने चयन समिति एवं सरोकार संस्था के प्रति आभार प्रकट किया।
प्रोफेसर मालवीय के लम्बे अरसे तक शिष्य रहे पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री वी ऐन राय ने कहा की यह वार्षिक आयोजन शहर के संस्कृतिक कैलेंडर में उपस्थिति दर्ज करवा रहा है। उन्होंने आगे कहा की हरि चरण प्रकाश जी को पूरस्कृत कर के यह पुरस्कार स्वयं सम्मानित हुआ है इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ इतिहासकार प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी की प्रोफेसर मालवीय की शख़्सियत को समझने के लिये उनके पूरे जीवन वृत पर नज़र डालनी होगी। उन्होंने आगे कहा की प्रोफेसर मालवीय प्राचीन भारतीय ऋषि परम्परा के जीवंत उदाहरण थे। उनके आवास पर जा कर गुरुकुल और आश्रम पद्धति की याद हो आती थी।
द्वितीय सत्र में ‘कहानी में ठहराव’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ. इसमें बोलते हुए युवा आलोचक श्री दिनेश ने कहा कि सोवियत संघ के विघटन और उदारवादी अर्थव्यवस्था के दौर में यह महसूस किया गया कि साहित्य सृजन और कलाओं में ठहराव आ रहा है. ख़ासकर साहित्य के क्षेत्र में नब्बे के बाद गतिरोध उत्पन्न हुआ. इस दौर में अधिकांश लेखक अरजनीतिक हुए. उन्होंने आगे कहा की पहले कहानियों के केंद्र में मानवीयता थी लेकिन आज की कहानियों में इसका लोप होता जा रहा है।
युवा कहानी कार दीपक श्रीवास्तव नें कहा की नव उदारवाद के बाद हमारी प्रतिबद्धताएँ बदल गईं और जब प्रतिबद्धताएँ बदलीं तो कहानी भी बदल गई.
इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ आलोचक कुमार बीरेन्द्र ने कहा कि कहानी समाज को जोड़ने वाली विधा है. पहले कहानी व्यवस्था के विरुद्ध लिखी जाती थी अब व्यवस्था नहीं बल्कि व्यवस्था का अतिरेक है जिससे अव्यवस्था पैदा हो रही है. इस सन्दर्भ में उन्होंने यीशु की कीले कहानी का विशेष उल्लेख किया.
अपने वक्तव्य में प्रो राजेंद्र कुमार ने कहा कि कहानी में ठहराव हक़ीक़त नहीं है. उन्होंने कहा कि ज़िंदगी की जद्दोजहद अब भी कहानी में आ रही है तो कहानी में ठहराव कैसे आ सकता है. दोहराव तो आ सकता है लेकिन ठहराव नहीं.
सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि कहानी ऐसी विधा है कि वह मर ही नहीं सकती. उन्होंने कहा कि आज हम पाते हैं कि कहानी नए कलेवर में हमारे बीच है.
इसके उपरांत शास्त्रीय संगीत संध्या का आयोजन हुआ. इसके अंतर्गत प्रियंक कृष्ण द्वारा सेकसोफ़ोन वादन प्रस्तुत किया गया. उन्होंने राग सूर मल्हार की प्रस्तुति दी. उनके साथ तबले पर अनूप बनर्जी ने संगत की.
इसके उपरांत पंडित विद्याधर मिश्र द्वारा राग पुरिया कल्याण प्रस्तुत किया गया. उनके साथ तबले पर विनोद मिश्र ने एवं हारमोनियम पर अनुराग मिश्र ने संगत की.
साहित्यिक कार्यक्रम का संचालन संजय श्रीवास्तव द्वारा एवं संगीत संध्या का संचालन रत्नेश दुबे ने किया. अतिथियों का आभार ज्ञापन प्रियदर्शन मालवीय ने किया.
इस मौक़े पर प्रो मालवीय के पारिवारिक सदस्यों के अलावा डाक्टर हरिश्चंद्र मालवीय,अजामिल,अविनाश मिश्र, सीमा आज़ाद, विश्वविजय, प्रो सूर्य नारायण, नरेश सहगल, श्रीवल्लभ, कृष्णाशंकर मिश्रा, का. नसीम अंसारी, का. जवाहर लाल विश्वकर्मा, झरना मालवीय, का. गायत्री गांगुली, का. हरीशचंद्र द्विवेदी, रामाज्ञा राय, वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरण जैन, बिशु भट्टाचार्य, संध्या नवोदिता, का. मुशतकीम इत्यादि बड़ी संख्या में साहित्य एवं संगीत प्रेमी उपस्थित रहे.

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