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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला  परमार्थ निकेतन से हुये विदा

 लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला  परमार्थ निकेतन से हुये विदा
परमार्थ निकेतन से विदा लेते हुये ओम बिड़ला ने विश्व शान्ति हेतु संसद भवन में वेद मंत्रों के उच्चारण के लिये स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों को किया आमंत्रित, ओम बिड़ला ने परमार्थ निकेतन के ऋषिकुमारों को एक आदर्श आचार्य बनने का संकल्प कराया
परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों को वितरित किये सर्दी के कपड़े, स्वेटर और शाल

ऋषिकेश, 2 नवम्बर। माननीय लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला जी ने आज परमार्थ निकेतन से विदा ली। चलते-चलते लोकसभा अध्यक्ष जी ने परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों को सर्दी के कपड़े, स्वेटर और शाल वितरित किये।

माननीय श्री ओम बिड़ला जी ने कहा कि पूज्य स्वामी जी का पावन सान्निध्य और माँ गंगा का तट अत्यंत शान्तिदायक है। मैं जब भी माँ गंगा के दर्शन करता हूँ अद्भुत ऊर्जा और शान्ति का अनुभव होता हैं।

श्री बिड़ला जी ने ऋषिकुमारों की दिनचर्या से प्रभावित होकर तथा विश्व शान्ति हेतु उच्चारित किये जाने वाले वेद मंत्रों का श्रवण कर उन्होंने स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों को आमंत्रित किया ताकि संसद भवन में लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु, अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥ शान्तिः शान्तिः शान्तिः आदि दिव्य मंत्रों का उद्घोष हो, इन दिव्य मंत्रों के अर्थो को समाज समझ सके, सर्वत्र सभी सुखी हो; सभी निरोगी हो, सभी का जीवन समृद्ध बने तथा भारत में, इस धरा पर और सर्वत्र शान्ति बनी रहे।

परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने देशवासियों को आवंला नवमी; अक्षय नवमी की शुभकामनायें देते हुये कहा कि अक्षय नवमी पर्व मनाने का शुभारम्भ द्वापर युग से हुआ हैं क्योंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने कंस का वध कर धर्म की स्थापना का अद्भुत कार्य किया था। कहा जाता है कि इस दिन आंवले का सेवन करने से उत्तम स्वास्थ्य का वरदान प्रदान होता है। साथ ही आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करने से स्वास्थ्य सिद्धि की प्राप्ति होती है।
भारतीय संस्कृति में सनातन संस्कृति और वैदिक काल से ही पेड़ों, वर्षा, सूर्य और चंद्र, नदी, पर्वत आदि प्राकृतिक शक्तियों के पूजन का विधान है। ऋग्वैदिक सूक्तों में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
भारतीय संस्कृति में वरुण, जल या समुद्र के देवता को ऋतु व प्राकृतिक संतुलन का रक्षक कहा गया है तथा वनस्पतियों की वैदिक काल में अत्यंत महत्ता थी। इनकी सुरक्षा के लिये ‘वनस्पतियों के अधिपति’ के रूप में सोम की पूजा की जाती थी आवंला नवमी उसी का प्रतीक है। स्वामी जी ने कहा कि मैं स्वयं प्रतिदिन आंवला, गिलोय, एलोवेरा, नीम और तुलसी के रस का सेवन करता हूूँ क्योंकि यह बहुत लाभदायक है।
स्वामी जी ने कहा कि आंवले को आरोग्य, अमरता उत्तम स्वास्थ्य का फल भी माना जाता है। आँवला दाह, खाँसी, श्वास रोग, कब्ज, पाण्डु, रक्तपित्त, अरुचि, त्रिदोष, दमा, क्षय, छाती के रोग, हृदय रोग, मूत्र विकार आदि अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति रखता है। आयुर्वेद में इसका उल्लेख किया गया है। इन दिव्य परम्पराओं के माध्यम से अपनी गौरवशाली संस्कृति से जुड़ें ताकि उसे जीवंत और जागृत बनाया जा सके।

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