मात्र 90 मिनट में हो गया 48 जोड़ों का विवाह,निरंकारी सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित

रिपोर्ट:शिवेश कुमार राय
निरंकारी मिशन के सामूहिक विवाह समारोह में 48 जोड़े परिणय सूत्र में बंधे, संत निरंकारी मिशन के तत्वावधान में शुक्रवार को यहां आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन सान्निध्य में 48 जोडे़ परिणय सूत्र में बंधे | संगम तट के पास परेड ग्राउंड में उत्तर प्रदेश के 44 वें प्रादेशिक निरंकारी संत समागम के शुभारंभ मौके पर यह समारोह संपन्न हुआ।
निरंकारी मिशन के सामाजिक सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत सादे, पर प्रभावशाली ढंग से आयोजित इस समारोह का शुभारंभ निरंकारी मिशन के पारंपरिक ‘जयमाला’ एवं ‘सांझा हार’ से हुआ | संगीत के बीच पवित्र मंत्र स्वरुप 4 निरंकारी लांवां पढ़ी गयी एवं हर लांवां के अंत में सद्गुरु माता सुदीक्षा जी एवं निरंकारी राजपिता रमित जी एवं अन्य श्रद्धालु भक्तों द्वारा इन नव परिणीत जोड़ों पर फूलों की वर्षा की गई।
विवाह समारोह के अंत में इन नव विवाहित जोड़ों को सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपनी दिव्य वाणी द्वारा आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि आज इस समारोह में दुल्हे और दुल्हनों के परिणय सूत्र में बंधने से दोनों ओर के परिवारों का मिलन हुआ है तो दोनों ने एक-दूसरे के परिवार को अपनाना है। आपस में ताल मेल रखते हुए प्रेम, नम्रता आदि दिव्य गुणों को अपनाकर जीवन में आने वाली जिम्मेदारियों को मिलजुल कर निभाना है।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में सत्संग, सेवा, सिमरण करते हुए निराकार प्रभू को तो प्राथमिकता देनी ही है, साथ ही घर-परिवार की जिम्मेदारी को भी बखूबी निभाना है। अंत में सत्गुरु माता जी ने नव विवाहित जोड़ों को जीवन का आध्यात्मिक पहलू मजबूत रखते हुए उनके जीवन में हर प्रकार के खुशियों की मंगल कामना की।
इनसे पूर्व जोगेंद्र मनचंदा ने निरंकारी शादियों की विशेषता दर्शाने वाले लांवां का सार बताते हुए कहा कि गृहस्थ की जिम्मेदारी वर एवं वधू दोनों की है। जब से संसार की रचना हुई है, गृहस्थ जीवन की मर्यादा को महत्व दिया गया है। उन्होंने कहा कि शारिरिक दृष्टि से तो एक नर है और एक नारी, किन्तु गृहस्थ आश्रम में दोनों का एक-दूसरे पर समान अधिकार है। प्रेम और शांति से उम्रभर सुख-दुख में इकट्ठे रहेंगे।
समारोह की विशेषताएं
सामूहिक समारोह की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वर वधू किसी एक निर्धारित ड्रेस में न होकर अपनी क्षेत्रीय वेशभूषा में ही सम्मलित हुए, इसमें न जाति-धर्म का भेद था और न ही क्षेत्र और पहनावे का भेद था। कुछ जोड़े तो ऐसे थे जो संत निरंकारी सेवादल की वर्दी ही पहने थे। विवाह का स्वरुप अंतरराज्यीय एवं अंतरजातीय था। इस विवाह समारोह में उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त बिहार, उतराखंड एवं मध्यप्रदेश से दुल्हे एवं दुल्हनें शामिल थी।
