“”गृहिणी”…सारा घर जिसका ऋणी””

लिखिका-जूही श्रीवास्तव
आसान कहां है गृहिणी होना
किताबे छोड़,गृहस्थी पढ़ना
एक एक फुल्का गोल सेकना
सहेलियां छोड़ दीवारों से बाते करना ।
पीला रंग उड़ाकर उनकी पसंद पहनना।
हांथ की घड़ी उतार , खनकती चूड़ियां पहनना।
कपड़ो के साथ सपने निचोड़ धूप में सुखाना
अपनी फिक्र छोड़ सबकी सुनना ।
मैथ के सवाल करते करते अचानक दूध के हिसाब करना
इतना आसान कहा है गृहिणी होना ………..
पर तुम खुद को कम मत आंको
गौरवान्वित हो .. क्योंकि तुम हो तो थाली में गर्म रोटी है ।
ममता की ठंडक है ,प्यार की ऊष्मा है।
तुमसे ही तो घर में दिया बाती है ..
घर लौटने की इच्छा है ।क्या बना है रसोई में ये देखने की चाहत है ।
रिश्तों में अनुबंध है ,पड़ोसी से संबंध है ।
घर की अनदेखी घड़ी हो तुम
सोना ,जागना ,खाना सबकी टिक टिक हो तुम ।
त्योहार होंगे तुम बिन ?
तुम ही तो हो दिवाली का दीपक ,होली के रंग, विजया की दशमी, रक्षा का सूत्र ..
इंतजार का खुला दरवाजा हो तुम
रोशनी की खिड़की और प्यार का समंदर हो तुम …
अनंत आकाश सा आंचल तुम्हारा
संघर्षों की धूप में छांव हो तुम
जानो खुद को और बताओ उनको भी …जो ये कहते है ” करती क्या हो तुम ?”
