4 जनवरी 1984 का ऐतिहासिक राम प्रकट उत्सव- शोभा यात्रा

विंग कमांडर धीरेन्द्र सिंह जफ़ा
सन् 1935 में उत्तर प्रदेश के एक ज़मींदार परिवार में जन्मे धीरेन्द्र सिंह जफ़ा ने 1954 में एक फ़ाइटर-पायलट के रूप में भारतीय वायु सेना में प्रवेश किया। वर्ष 1964 में एयरफोर्स की तरफ से उन्हें एयर अटैक इन्स्ट्रक्टर की ट्रेनिंग के लिए अमेरिका भेजा गया। सन् 1965 में उनकी तैनाती अम्बाला एयरबेस पर हुई; उसी समय पाकिस्तान के साथ भीषण युद्ध छिड़ गया। पराक्रमी जफ़ा ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए 23 बार पाकिस्तान पर जबरदस्त हमले किये। उनकी पेशेवर कुशलता और लगन को देखते हुए उन्हें सुपरसोनिक फाइटर सुखोई एसयू-7 लड़ाकू विमान स्वदेश भारत लाने के लिए रूस भेजा गया। उन्हीं के प्रयासों की बदौलत स्क्वाड्रन नंo 26 बहुत ही कम समय में सुखोई एसयू-7 लड़ाकू बमवर्षक विमान से लैस देश का प्रथम स्क्वाड्रन बन गया। जफ़ा के इस उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वायुसेना पदक से सम्मानित किया।
तत्पश्चात, रॉयल एयर फोर्स स्टाफ कॉलेज, यूनाइटेड किंगडम से उत्कृष्टता (Distinction)के साथ स्नातक हो कर वे वर्ष 1970 में भारत लौटे और जनवरी 1971 में उनकी तैनाती वायुसेना मुख्यालय में एयर चीफ़ मार्शल के परिसहायक अफ़सर (Aide-De-Camp) के प्रतिष्ठित पद पर हुई। परन्तु 10 माह बाद ही जब पाकिस्तान के साथ युद्ध अवश्यम्भावी हो चला था, तब उन्होंने कर्तव्य को स्वयं से ऊपर रखने वाले सैनिक की भाँति, वायुसेना मुख्यालय, दिल्ली में वायुसेना प्रमुख के साथ सुरक्षित एवं प्रतिष्ठित कार्य को छोड़ने का व्यक्तिगत निर्णय नवंबर 1971 में लियाऔर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों को पीछे छोड़कर स्वेच्छा से अपने आपको समर्पित किया। वायुसेना प्रमुख ने अनिच्छापूर्वक उनके इस आग्रह पर सहमति दी। देश की रक्षा के लिए स्वेच्छा से युद्ध में शामिल होने का जफ़ा का ये फैसला भारतीय वायुसेना के इतिहास का एक बेमिसाल वाक्या है।
4 दिसम्बर 1971 को फिरोजपुर के हुसैनीवाला क्षेत्र में जब शत्रु ने हमारी एक इन्फेंट्री बटालियन को घेर लिया तब उन्होंने शत्रु पर 12 हवाई हमले करते हुए सात टैंकों और एक जीप को ध्वस्त कर दिया। इस कार्यवाही से शत्रु के आक्रमण को बड़ा धक्का लगा और हमारे घिरे हुए सैनिक घेरे से निकलने में सफल हो गए। 5 दिसम्बर 1971 को अमृतसर के पशिचम में शत्रु हमारे ठिकानों पर लगातार गोलियाँ बरसा रहे थे। शत्रु के तोप ठिकानों पर हमला करने के लिए उन्होंने चार लड़ाकू विमानों वाले स्ट्राइक मिशन का नेतृत्व किया। भारी गोलाबारी के बावजूद उन्होंने एक के बाद एक सफल हमले किये, लेकिन छठे हमले में उनका सुखोई एसयू-7 विमान जमीनी गोलाबारी का निशाना बन गया और उसमें आग लग गयी। उन्हें जलते हुए विमान से पाकिस्तानी सीमा क्षेत्र में कूदना पड़ा। उनको रीड़ की हड्डी में गम्भीर चोटें आयीं एवं एक साल तक पाकिस्तान में युद्धबंदी के रूप में रहना पड़ा। यद्यपि, जफ़ा खुद बंदी बने मगर बांग्लादेश आजाद हो गया।
दिसम्बर 1972 में स्वदेश वापसी पर भारत सरकार ने उच्च कोटि की वीरता एवं नेतृत्व कौशल के लिए उन्हें ‘वीर-चक्र’ से सम्मानित किया। परन्तु पैराशूट के सहारे जहाज़ से कूदने पर उनकी रीढ़ की हड्डी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी, जिसके कारण उनको वायुसेना से असमय अवकाश लेना पड़ा। उसके बाद जफा ने अयोध्या में प्रवास करते हुए साहित्य और समाज को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया।
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी विंग कमांडर जफ़ा के देश के प्रति अटूट लगाव के साथ ही लेखन एवं सामाजिक कार्यों में भी गहन रुचि रही। जफ़ा ने देश का सिपाही बनके सरहदों की रक्षा के लिए जान जोखिम में डाली; साथ ही कलम का सिपाही बन युद्ध के अनुभवों एवं क्रिया-कलापों को अपनी पुस्तक ‘जब भी देश पुकारेगा…..’ में लिपिबद्ध किया, जो युवाओं के लिए देश-सेवा की भावना का अद्भुत प्रेरणा- स्रोत है।इसके अलावा उन्होंने ‘शिवनारायण’, ‘नजमा’,‘दो अण्डे’ और ‘पेंशनर’ जैसी कहानियों में सामाजिक, परिवारिक आदि प्रसंगों को केंद्र में रखते हुए रचना की है।
राष्ट्रहित में देश रक्षा के बाद जफा ने अपने जीवन में और एक अति महत्वपूर्ण कार्य किया है और वो है उनका राम मंदिर आंदोलन में एक अभूतपूर्व योगदान, जो राम मंदिर निर्माण आंदोलन को नई ऊर्जा और दिशा देने वाली साबित हुई। आज जब अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम निकट है और सारा देश राममय है, और हर आदमी अपने-अपने स्तर से इस राष्ट्रीय उत्सव से किसी ना किसी प्रकार से जुड़ने के लिये आतुर है। उस समय उनके योगदान को याद करना एक जिम्मेवारी और कृत्यज्ञता का कार्य हो जाता है।
रामलला के प्राक्ट्य के अगले साल 1950 से पौष शुक्ल तृतीया को हर वर्ष राम प्रकट उत्सव औपचारिक रूप से विवादित स्थल के बाहर किया जाता था। अभी तक शांत तरीके से और सरकारी नियमों के अधीन होने वाला यह उत्सव वर्ष 4 जनवरी 1984 में चौतीसवीं (34वीं) वर्षगांठ पर, धीरेन्द्र सिंह जफ़ा के विशेष प्रयसों के चलते इस बार राम प्रकट उत्सव विशेष उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भव्य शोभा यात्रा का आयोजन किया गया, पूरे विवादित स्थल को बिजली के झालरों से सजाया गया और आंदोलन के इतिहास में पहली बार विवादित ढाँचे के बुर्ज पर हनुमान पताका फहराई गई और गर्भगृह में पहली बार हवन किया गया; ये दोनों ही बातें अभूतपूर्व एवं अति महत्वपूर्ण थी। यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई और इसका असर दिल्ली तक हुआ। यह कार्यक्रम पूरे राम मंदिर आंदोलन के लिये उत्प्रेरक सिद्ध हुआ और राम मंदिर निर्माण की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर जीवंत हो उठी जिसके दूरगामी परिणाम हुए। जफ़ा के पुत्र सरित जफ़ा उप नियंत्रक महालेखापरीक्षक (रक्षा) ने अपने पिता के साहसी कार्य पर मीडिया से बात करते हुए बताया कि इस ऐतहासिक तथ्य को पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव, और अन्य प्रमुख व्यक्तियों ने अपनी-अपनी पुस्तकों में प्रमुखता से उद्धृत किया है।
अयोध्या के वनवास से राज्याभिषेक तक की इस यात्रा में जिन ज्ञात-अज्ञात लोगों ने सदप्रयास किया, उनका यथोचित सम्मान अयोध्या का सम्मान होगा। आज अयोध्या का आधुनिक निर्माण हो रहा है जो अत्यंत प्रसन्नता का विषय है पर इस नव निर्माण में नींव के ईंट खो न जाए इसके लिए भी कुछ सोचना होगा ताकि भविष्य के साथ हमारा इतिहास भी सुरक्षित और प्रत्यक्ष रहें, जिससे हमारी युवा पीढ़ी इन महानुभवाओं से प्रेरणा प्राप्त कर राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए आगे आए।
