अधिक पढ़ाई, अधिक पैसे होते हुए भी युवक दुखी एवं असंतुष्ट क्यों-ठाकुर दलीप सिंघ

आज की युवा पीढ़ी की तुलना में, उन के माता-पिता कहीं अधिक सुखी एवं संतुष्ट जीवन व्यतीत करते थे एवं कर रहे हैं। इस का मुख्य कारण है कि वह अधिक संयमी, अनुशासित और आत्मनियंत्रित थे। भले ही आज के युवा, शिक्षा में अपने माता-पिता से आगे निकल चुके हैं, अनेक डिग्रियाँ प्राप्त कर चुके हैं। तथा, उन के पास पैसा भी कहीं अधिक है। परंतु संयम एवं आत्मनियंत्रण न होने कारण मानसिक सुख में वह अपने पूर्वजों के आस-पास भी नहीं ठहरते।
स्वस्थ, पौष्टिक भोजन खाने कारण उन के माता-पिता न केवल शारीरिक रूप से अधिक स्वस्थ थे, बल्कि मानसिक रूप से भी कहीं अधिक संतुलित एवं प्रसन्नचित्त रहते थे। जब वह बाज़ार जाते तो हर वस्तु को देख कर तुरंत उसे लेने या खाने की लालसा नहीं करते थे। उन का अपने ज्ञानेंद्रियों पर बढ़िया नियंत्रण था। वह रसना के स्वाद के इतने गुलाम नहीं थे, जितने आज के युवक बन चुके हैं।रसना का आनंद लेना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन रसना के वश हो जाना हानिकारक है। यही आज के युवाओं की सब से बड़ी कमजोरी बन गई है। वह चिप्स, चॉकलेट, पिज़्ज़ा, बर्गर, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक्स, टिक्की, समोसे, मिठाइयां जैसी हानिकारक वस्तुओं के लिए उत्सुक रहते हैं। परंतु, फल, सब्ज़ियाँ, दूध, घी, बादाम, काजू जैसी पौष्टिक और स्वस्थ वस्तुओं के प्रति उन में वह आकर्षण नहीं होता।
यही कारण है कि आधुनिक युवा, भले ही ज्ञान और तकनीक में आगे हों, परंतु संयम न होने कारण स्वास्थ्य, मानसिक सुख एवं प्रसन्नता के मामले में अपने पूर्वजों से कहीं पीछे रह गए हैं। युवकों की ऐसी सोच बनने के पीछे मुख्य कारण: टैलिविजन, इंटरनेट एवं सोशल मीडिया है, जो उन को ऐसी स्वादिष्ट परंतु हानिकारक वस्तुओं का प्रयोग करने के लिए सदा ही प्रेरित करता है।
