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दो युगों का अद्भुत प्रेम फिर हुई भेंट…..

दो युगों का अद्भुत प्रेम फिर हुई भेंट…..

अयोध्या,पौराणिक ग्रन्थों में निहित एवं किवदंतियों में प्रचलित प्रभु श्रीराम के बालसखा निषादराज गुह्य एवं कुलगुरु ब्रम्हश्रृषि वशिष्ठ के संबंध अयोध्या से युग युगांतर का रहा है।
राजगुरु वशिष्ठ और निषादराज के बीच सीधा संबंध तो रामायण में वर्णित नहीं दिखाया गया है, अपितु निषादराज गुह्य प्रभु श्रीराम के परम मित्र व एक ही आश्रम व गुरु से शिक्षा प्राप्त किया था,
गुरु वशिष्ठ इक्ष्वांकु वंश के राजगुरु अथवा गुरु थे। निषादराज गुह्य को श्रीराम के राज्याभिषेक के समय सबसे योग्य मानकर उनके सम्मान में श्रीराम ने ब्रम्हश्रृषि वशिष्ठ से विशेष स्थान दिलाने का आग्रह किया था।
कहते हैं इतिहास ही नहीं अपितु युग की भी पुनरावृत्ति होती है।
त्रेतायुग में राजगुरू वशिष्ठ ने प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक के समय निषादराज गुह्य को अयोध्या में सम्मान व आशीर्वाद दिलाने में योगदान दिया था वह पारितोषिक निषादराज गुह्य के वंशजो को वर्तमान युग तक अविस्मरणीय रहा है।
कुछ ऐसा ही पुनरावृत्ति अयोध्या की पावन भूमि पर हुआ जिसे देखकर हर अयोध्या व श्रृंग्वेरपुरवासियों के नयन सजल हो गये।
अयोध्या के राजगुरु व ब्रम्हश्रृषि गुरु वशिष्ठ के वंशज अयोध्या धाम के वर्तमान यशस्वी महापौर श्रीमंत श्री गिरीश पति त्रिपाठी व प्रभु श्रीराम के बालसखा श्रृंग्वेरपुर महाराज निषादराज गुह्य के वंशजों का अयोध्या की पावन भूमि पर स्नेह मिलन ने यह सिद्ध कर दिया कि नि:स्वार्थ, समर्पण व सेवा का प्रतिफल किसी भी युग में प्राप्त हो सकता है।
निषादराज गुह्य के वंशज एवं श्रृंग्वेरपुर राज्य के वर्तमान महाराज डॉ०बी.के.कश्यप “निषादराज”, राजमाता निर्मला देवी, कुलवधू रीता निषाद, राजकुमार अथर्व सहित श्रृंग्वेरपुर राज्य के निवासियों संग जब गुरु वशिष्ठ के वंशज श्रीमंत गिरीश पति त्रिपाठी के अयोध्या स्थित राजमहल पहुंचे तो गुरु वशिष्ठ के वंशजों ने सकुटुंब ऐसी आवभगत किया कि सभी किंकर्तव्यविमूढ़ रह गए।
श्रीमंत गिरीश पति त्रिपाठी जी ने निषादराज गुह्य के वंशज डॉ०बी.के.कश्यप को गले लगा लिया वहीं गुरु वशिष्ठ की कुलवधू राजलक्ष्मी ने निषादराज गुह्य की कुलवधू रीता निषाद व राजमाता निर्मला देवी को हृदय से लगाकर अभिनन्दन कर मित्रता के समर्पण भाव को प्रकाशित किया।
विदाई के समय राज परंपरा के अनुसार ढेर सारे उपहार भेंट भी किया और दोनों परिवारों ने पुनः मिलन का संकल्प भी लिया ।
वृहद बौद्धिक परिचर्चा के पश्चात् दो युगों के विछोह का दृश्य उपस्थित हर व्यक्ति के नयन सजल कर गये ।

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