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श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व एवं नई शिक्षा नीति में  उपयोगिता पर प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव ने माघ मेले में विचार व्यक्त किये

श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व एवं नई शिक्षा नीति में  उपयोगिता पर प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव ने माघ मेले में विचार व्यक्त किये


प्रयागराज। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) इलाहाबाद, प्रयागराज के यांत्रिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव ने माघ मेला के पावन अवसर पर संगम तट पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में श्रीमद्भगवद्गीता के महत्व एवं नई शिक्षा नीति (एनईपी) में इसकी उपयोगिता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन, कर्तव्यबोध, नैतिकता और समन्वित शिक्षा का अद्भुत मार्गदर्शक है, जिसकी प्रासंगिकता आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में और भी अधिक बढ़ गई है।
प्रोफेसर श्रीवास्तव ने सरकार द्वारा प्रस्तावित आध्यात्म विश्वविद्यालय, प्रयागराज की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय समन्वित शिक्षा के नए आयाम स्थापित करेगा। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में कारीगरी ही यांत्रिकी अभियंत्रण का मूल आधार थी। यंत्रों के माध्यम से निर्माण, नवाचार और व्यापार का विकास हुआ, जिससे समाज की आर्थिक संरचना मजबूत हुई। यही अभियांत्रिकी ज्ञान आगे चलकर जानपदीय विज्ञान, विद्युत, सूक्ष्म तकनीक, कला, साहित्य, वाणिज्य और संस्कृति से जुड़कर समाज की बौद्धिक और आर्थिक प्रगति का सशक्त माध्यम बनी।
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के अंतर्गत इसी समन्वित दृष्टिकोण को आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है। आध्यात्म विश्वविद्यालय, प्रयागराज में इतिहास, संस्कृत, भूगोल, कला, ब्रज संस्कृति, वाणिज्य एवं अभियांत्रिकी जैसे विषयों को एक साथ जोड़कर शिक्षा देने का प्रस्ताव एजुकेशन 4.0 मॉडल और भारतीय ज्ञान परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। वेदों में निहित शिक्षा, प्रकृति-संतुलन और नवाचार की भावना को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर यह विश्वविद्यालय युवाओं के लिए रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता के नए अवसर सृजित करेगा।
प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि यह पहल माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की “वसुधैव कुटुम्बकम्” और विश्व एकत्व की भावना के पूर्णतः अनुरूप है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह प्रयास भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित, आत्मनिर्भर और ज्ञान-आधारित राष्ट्र बनाने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगा। कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों, शिक्षाविदों और श्रद्धालुओं ने इस विचार को सराहना के साथ स्वीकार किया। नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा का स्वरूप और अभियांत्रिकी की पढ़ाई को भी उपरोक्त सभी विषयों से जोड़कर ही भारत के नव रोज़गार को पैदा करना है। भगवान श्रीकृष्ण ने संदीपनी आश्रम में गुरुदेव की कृपा से जो चौसठ कलाएँ अर्जित की उनकी सभी कलाएँ जोकि श्रीमद्भागवत में भी वर्णित है जैसे वायु यान शस्त्र निर्माण कठपुतली निर्माण, बढइगिरी, शय्या निर्माण इत्यादि की शिक्षा ही अभियांत्रिकी द्वारा देखकर आज अनेकों रोज़गार पैदा किए जा सकते हैं।

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