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आधुनिक परिवेश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भाषा’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

आधुनिक परिवेश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भाषा’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

प्रयागराज
हिन्दुस्तानी एकेडेमी उ०प्र०, प्रयागराज के तत्वावधान में आधुनिक परिवेश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भाषा’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दुस्तानी एकेडेमी के गांधाी सभागार में किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम के प्रारम्भ में एकेडेमी के सचिव डाॅ. अजीत कुमार सिंह ने आमंत्रित अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न और शाॅल देकर किया। अतिथियों का स्वागत करते हुए डाॅ. अजीत कुमार सिंह ने कहा कि ‘एआई से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है। वास्तविक सृजित साहित्य में और एआई के द्वारा सृजित साहित्य में एक बड़ा अन्तर है। वास्तविक साहित्य जो संवेदना के आधार पर लिखा जा रहा था, पढ़ा जा रहा था वो आपकी संवेदना पर निर्भर करता था परन्तु आज एआई के द्वारा आपके दिये गये कमांड के आधार पर लिखा जायेगा।’ संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो. शर्वेश पाण्डेय, प्राचार्य, डी.सी.एस.के. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मऊ ने कहा कि ‘वर्तमान दौर को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर के रूप में जाना जा रहा है। जीवन के हर क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का महत्व बढ़ा है। भाषा के दृष्टि से विचार करें तो एआई भाषा के लिए एक चुनौती बनी है। एआई के भाषा में उपयोग के कारण भाषा में जहां तकनीकी अनुसंधान की आवश्यकता है, वहीं भाषा के तमाम उपकरणों और अवयवों को ऑनलाइन अपलोड करना अनिवार्य हो गया है। इस तरह से यदि वर्तमान परिवेश में एआई और भाषा पर विचार करें तो हम पाते हैं कि हिंदी भाषा की व्याकरणिक संरचना पश्चिम से प्रभावित होने के नाते अभी अनुवाद में संरचना का पश्चिमी प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि हिंदी भाषा के भाषा वैज्ञानिक अध्ययन में पाश्चात्य टूल्स अधिक उपयोग होते रहे हैं। परिणामस्वरुप हिंदी को समझने के लिए पश्चिम उपकरण ही एआई द्वारा प्रयोग किये जा रहे हैं। समय की मांग है कि भारतीय चिंतन परम्परा पर आधारित भाषा चिंतन के आयाम को ऑनलाइन अपलोड किया जाए, जिससे एआई के डाटा में भारतीय चिंतन परम्रा विद्यमान हो। भाषा के समक्ष जो सबसे बड़ी चुनौती है, साहित्य को लेकर और भाषा के चिंतन को लेकर कि अभी भी एआई के डाटा में हिंदी भाषा का भाषा वैज्ञानिक चिंतन और साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है। इसके कारण हम भाषा में जिस तरह का उपयोग एआई के माध्यम से करना चाह रहे हैं वह नहीं कर पा रहे हैं। वर्तमान परिवेश में एआई भाषा के अध्यताओं के लिए और भाषा के प्रयोगकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण हो सकता है। जब हम भाषा के तथ्यों का, भाषा चिंतन का, भाषा के साहित्य का प्रचुर मात्रा में ऑनलाइन उपयोग सुनिश्चित करें।’ संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह, निदेशक, गोबिन्दबल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज ने कृत्रिम बुद्धि और भाषा को रोचक शैली में बताते हुए कहा कि “कहते हैं दीवालों के भी कान होते हैं”, अब अहर्निश सुनने वाला हमारे साथ का मोबाइल सब कुछ चुपचाप सुनता रहता है। एआई से शब्दों के पंख लग गए हैं। हमारे प्रत्येक शब्द सिलिकॉन वैली के खजाने में संचित हो रहें हैं। आगे उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धि मनुष्य की चेतना के समांतर रोबोटिक माइंड और रोबोटिक चेतना का निर्माण कर रही है। यह रोबोटिक चेतना पौराणिक काल के “माया” की तरह है। इसको अस्त्र बनाकर मनुष्य के साथ छल करना आसान आसान हो रहा है। कृत्रिम बुद्धि भाषा की अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति को प्राप्त कर चुकी है और भाषा के बैखरी, मध्यमा और पश्यंती स्तर तक पहूँच चुकी है। कृत्रिम बुद्धि की भाषा के बारे में बताते हुए प्रोफेसर सिंह ने कहा कि भाषा की सबसे जटिल स्थिति कविता के भाषा की होती है, एआई अब मानव भाषा संरचना की संश्लिष्ट उपलब्धियाँ जैसे बिम्ब, प्रतीक, शैली, उलटबाँसी को समझने और लिखने में समर्थ है जो कविता में प्रयोग की जाती है। कृत्रिम बुद्धि हमारे बोलने की नितांत व्यक्तिगत टोन और शैली को पकड़ कर उसी टोन और शैली में बात कर सकती है। यही कारण है कि न केवल सोशल मीडिया बल्कि व्यक्तिगत व्यवहारों में आडियो वीडियो कॉल के द्वारा छद्म बातचीत संभव हो गया है। पौराणिक काल के मायावी ताकत को इसी रूप में देखा जा सकता है। डेटा एल्गोरिद्म ने कृत्रिम बुद्धि को मनुष्य अनुभव के समांतर रोबोटिक चेतना को अनुभव समर्थ कर दिया है जिसके बल पर आज मनुष्यों के संवेदन के अनुकूल मशीनें काम कर रहीं हैं।लिखित भाषा के संबंध में एआई की समझ के बारे में प्रोफेसर सिंह ने उद्घाटित करते हुए बताया कि कृत्रिम बुद्धि न केवल हमारे लेखन को पहचान देती है वरन् हमारे हस्ताक्षर को देख कर यह भी विश्लेषित कर सकती है कि किस परिस्थिति और मनोभाव में हस्ताक्षर किया गया है।’ संगोष्ठी का संचालन डाॅ. विनम्रसेन सिंह सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने किया। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डाॅ. अजीत कुमार सिंह ने किया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्धानों में प्रो. रामकिशोर शर्मा, डाॅ. उदय प्रताप सिंह, रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’, डाॅ. अनिल कुमार सिंह, जय कृष्ण राय ‘तुषार’, डाॅ. अमिताभ त्रिपाठी, सुनील दानिश, जनकवि प्रकाश, डाॅ. मनोज कुमार यादव, एम. एस. खान सहित शोधार्थी एवं शहर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

 

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