प्रसंगवश
वरिष्ठ पत्रकार श्रीकेश चौबे:-
भ्रष्टाचार में ईमानदारी की शपथ
मुंबई श्रुकेश चौबे:-
हमारे समाज में भ्रष्टाचार का वायरस व्यवस्था की रगों में किस कदर घर कर चुका है उसकी बानगी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय के जनप्रतिनिधियों की हरकत से उजागर हुई। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल होता दिखा, जिसमें पार्षद राउंड टेबल के चारों ओर खड़े होकर शपथ लेते नजर आए कि वे भ्रष्टाचार की कमाई के बंटवारे में ईमानदारी दिखाएंगे। इस घटना के बाद खासा बवाल मचा कि कैसे भ्रष्टाचार की कमाई के लिए भी बाकायदा सिंडिकेट रूप में काम किया जा रहा है। यह वाकया हमारे समाज में व्यवस्था की सड़न को तो दर्शाता ही है, साथ ही भ्रष्टाचारियों के दुस्साहस को भी सामने लाता है। यह घटना हमारी लोकतंत्र की छोटी इकाई में चुने गए नुमाइंदों के चरित्र, सोच और इरादों को तो दर्शाती है, समाज में जीवन मूल्यों के पराभव के बिंब भी उकेरती है। समाज को यह भी संदेश देती है कि हम छोटे-छोटे लालचों के लिये कैसे पार्षद चुनते हैं। जाति, धर्म व क्षेत्र तथा संकुचित आकांक्षाओं के लिये घटिया प्रतिनिधियों को स्थानीय निकायों में अपने हितों पर कुठाराघात के लिये चुनते हैं। यह तो भविष्य बताएगा कि आने वाले समय में इन पार्षदों के खिलाफ पार्टी विशेष की तरफ से क्या कार्रवाई होती है, लेकिन यह घटना भारतीय समाज में घर करते भ्रष्टाचार की एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को जरूर उजागर कर गयी। जब देश आजाद हुआ तो राजस्थान में एक विधायक ऐसा चुना गया, जिसके पास जयपुर जाकर शपथग्रहण में शामिल होने का बस किराया भी नहीं था। बाद में लोगों ने चंदा एकत्र करके उस विधायक को जयपुर भेजा था। आज हमारी जनप्रतिनिधि संस्थाओं में सैकड़ों करोड़पति-अरबपति जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति समाज में आर्थिक विषमता की तसवीर उकेरती है। गाहे-बगाहे सामने आने वाले आंकड़े बताते हैं कि विधायक व सांसद बनने के बाद उनकी आय दिन दोगुनी-रात चौगुनी गति से बढ़ती है। अगले चुनाव में वे अपनी संपत्ति का जो दिखाई दे सकने वाला ब्योरा जारी करते हैं, उसमें यह समृद्धि स्पष्ट नजर आती है।
निस्संदेह हम जानते हैं कि हमारी व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार समाज को दीमक की तरह खोखला कर
रहा है। तमाम अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में भ्रष्टाचार की वैश्विक सूची में हमारी स्थिति शर्मसार करने वाली है। लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर हमारी उदासीनता दुर्भाग्यपूर्ण है, सरकारों के स्तर पर भी और समाज के भी। बहरहाल, उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की नगर परिषद के पार्षदों द्वारा हाथ में जल लेकर ऊपरी कमाई को ईमानदारी से बांटने की खबर परेशान करती है। यह घटना सवाल उठाती है कि नगर निगमों की जो बदहाली है उसके मूल में क्या यह निगम की आय की बंदरबांट ही है? सवाल यह भी है कि जिस दल के ये पार्षद हैं उसने क्या ऊपरी कमाई के लिए शपथ मामले में कोई कार्रवाई की? प्रश्न यह भी कि जिला प्रशासन ने इस मामले में कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? जैसे कि अक्सर ऐसे मामलों में कार्रवाई करने के बजाय सिर्फ लीपापोती ही होती है, इस मामले में भी ऐसा हुआ है। शीर्ष अधिकारी की दलील थी कि इस संदर्भ में कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई है। क्या समाज हित में स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई नहीं की जा सकती? प्रश्न यह भी कि क्या कोई विपक्षी दल का नेता अपने राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए मामला दर्ज कराएगा तभी ऐसे मामले में कार्रवाई होगी? बड़ा सवाल इस मामले में समाज की उदासीनता का भी है? यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि समाज में किसी भी तरह का भ्रष्टाचार ऐसे लोगों के साथ अन्याय होता है जिनका इसमें कोई कसूर नहीं होता। लेकिन उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। यह भी कि व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ तब आवाज उठाता है जब वह पीड़ित होता है। अन्यथा वह इसे नजरअंदाज कर देता है। बल्कि बहुत सारे लोग इसे सुविधा शुल्क के रूप में स्थापित करने की कुत्सित कोशिश भी करते हैं। जब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिरोध के सुर प्रबल नहीं होते हमारे समाज में यह संकट बना रहेगा
