गुनाहों का देवता के नाट्य मंचन ने दर्शकों को झकझोरा

स्नेह और प्रेम जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचने लगे तो उसका त्याग करने का गुनाह है न अजीब बात। घर भर में अल्हड़ पुरवाई की तरह तोड़-फोड़ मचाने वाली सुधा, चंदर की आंख के एक इशारे से शांत हो जाती थी कब और क्यूं उसने चंदर के इशारे का मौन अनुशासन स्वीकार कर लिया था, ये उसे खुद भी मालूम नहींे था और ये सब इतने स्वाभाविक इतना अपने आप होता गया कि कोई इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं था। दोनों का एक दूसरे के प्रति अधिकार इतना स्वाभाविक था जैसे शरद की पवित्रता।
उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज की ओर से मासिक नाट्य योजना के तहत शुक्रवार को धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहोेे का देवता का तमाल बोस के निर्देशन में मंचन किया गया।
गुनाहों का देवता एक अनसुलझी प्रेम कहानी है, जो प्रोफेसर साहब की बेटी सुधा और उनके शिष्य चंदर के बीच निःस्वार्थ प्रेम को दर्शाता है। जो समाज के ऊंच-नीच के बीच में फंस कर अपनी प्रेम कहानी का अंत कर देते हैं। चंदर, सुधा से प्रेम करता था, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए एहसान ने उसे कुछ ऐसे घेरे रखा कि वह चाहते हुए भी कभी भी अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाता है। सुधा की नजरों में वह देवता बने रहना चाहता है।
गुनाहों का देवता में सुधा से उसका नाता वैसे ही रहता है, जैसे देवता और भक्त का होता हैै। चंदर के जीवन में सुधा व पम्मी साथ ही बिनती भी आती है अंत में वह चंदर की साथी भी बनती है। प्रेम को लेकर चंदर का द्वंद पूरे नाटक में हावी रहता है। सुधा का चंदर की जीवन से चले जाना दर्शकों को भावविभोर कर देता है। सितारे टूट चुके थे, तूफान खत्म हो चुका था, नदी फिर से बहने लगी थी, ने दर्शकों को झकझोर दिया। अभिनय में चन्दर की भूमिका में ऋषभ पाण्डेय व सुधा की भूमिका में अर्पिता ने चार चांद लगा दिये। इस मौके पर काफी संख्या में दर्शक एवं केंद्र के अधिकारी व कर्मचारी मौजूद रहें।
