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पूजन में प्राणायाम और मुद्रा प्रदर्शन की अनिवार्यता होनी चाहिए,डॉ नरेंद्र नाथ व्यास जी

पूजन में प्राणायाम और मुद्रा प्रदर्शन की अनिवार्यता होनी चाहिए,डॉ नरेंद्र नाथ व्यास जी


जय अंबा गौशाला एवं जय अंबा धाम पर चल रहे श्री लक्ष्मी नारायण एवं परशुराम जी के प्रतिष्ठा के अवसर पर शिव शक्ति धाम हालोली पालघर के पीठाधीश्वर आचार्य पंकज जी महाराज के निर्देशन में चल रहे इस यज्ञ में अंतिम दिन प्रयाग से पधारे हुए स्वामी योगानंद आश्रम के डॉक्टर नरेंद्र नाथ व्यास जी ने कथा के माध्यम से लोगों को प्रेरणा प्रदान किया और बताया कि भगवान सब पर बराबर कृपा करते हैं,भक्तों की पात्रता पर निर्भर करता है कि उनकी ग्रहण शक्ति कैसी और कितनी है,वृष्टि  सर्वत्र होती है,बाल्टी लोटा गिलास तालाब अलग अलग मात्रा में अपने अपने हिसाब से जल भंडार करते हैं,अतः संसार में शांति में जीवन व्यतीत करने के लिए भगवान की शरणागति एवं उनके कृपा पर पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास रखना चाहिए,प्रहलाद जी को घर से मुक्ति मिली,भरत जी वन में जाकर के भी फंस गए,अतः रागी और विरागी दोनों से ऊपर उठकर वीत रागी बनना चाहिए,काम ना छोड़ें कामना छोड़ें,वास ना छोड़ें वासना छोड़ना चाहिए, सत्कार्यमानकर्तव्यं दंड कासायधारणं। से सन्यासी  न वक्तव्यः। सन्यासी ज्ञानतत्परः।इसी क्रम में श्री व्यास जी ने यह भी बताया कि भगवान के नाम का स्मरण 10 अपराध से मुक्त होकर करने पर समग्र फल की प्राप्ति होती है,वैसे तो प्रभु का नाम चाहे जैसे भी लिया जाए भूलवश भी लिया जाए तो वह मुक्ति दायक हो जाता है,परंतु शास्त्रों ने बताया है कि अगर 10 अपराध से मुक्त होकर के राम के नाम का स्मरण किया जाए तो वह मुक्ति दायक होता है,राम राम सब कोई कहे दशरित कहे ना कोई, एक बार दशरित कहे कोटि यज्ञ फल होय,शास्त्रों में 10 प्रकार के अपराध नाम संकीर्तन में बताए गए हैं,सत्पुरुषों की निंदा न करें, नाम के वैभव की कथा न कहें, क्योंकि नाम के वैभव को कहने की सामर्थ्य हम सबमें नहीं है,राम न सकहि नाम गुण गाई,वेद शास्त्र और पुराणों की निंदा ना करें, आप्तपुरुषों के वाक्यों में अविश्वास करते हुए टीका टिप्पणी न करें,विष्णु शंकर और ब्रह्मा जी या अन्य देवताओं में उच्च और नीच के भेद न करें इसी क्रम में मूर्ति प्रतिष्ठा के विषय में श्री व्यास जी ने चर्चा किया कि ब्राह्मण आचार्य वेद मंत्रों के द्वारा और अनेक प्रकार की विधियों के द्वारा मूर्तियों का संस्कार करते हैं मूर्तियों में प्राण संचार तो भक्तों की भावना के अनुरूप होता है ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं कि भक्तों की भावना के अनुरूप भगवान को कहीं भी प्रकट होना पड़ता है पूजन में प्राणायाम और मुद्रा प्रदर्शन की अनिवार्यता होनी चाहिए क्योंकि देवताओं का निवास शरीर में भी होता है और तक संबंधित देवताओं को उचित समय पर चित्र प्रेरणा हेतु जागृत करने की आवश्यकता होती है इसलिए मुद्राओं के द्वारा हम शरीर को स्वस्थ करते हैं और स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है लिखा है कि जिस तरह से धातुओं के मल को अग्नि जलाकर भस्म कर देती है उसी तरह से मनुष्यों के शरीर के भीतर अनेक प्रकार के दोषों को दहन कर देता है प्राणायाम इस अवसर पर राजेश पाटील आमदार राजस्थान से आए हुए ओम शर्मा परशुराम सेना के संस्थापक एवं अध्यक्ष तथा यमल शिक्षक विधायक और भी अनेक गणमान्य नेता और क्षेत्र के सम्मानित व्यक्ति उपस्थित रहे।

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