आधुनिकता और रूढिवादिता के द्वंद को उजागर करता त्रिशंकु नाटक

नाटक में रंगकर्मी व प्रेक्षक दर्शकों को जीवन के सही अंदाज का अनुभव कराते हैं। नाटक समस्याओं से भरे जीवन के सही अर्थ से अवगत कराकर लोगों को सोचने पर विवश करता है। शुक्रवार को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र,प्रयागराज द्वारा मासिक नाट्य योजना के तहत सेन्टर फ़ॉर थियटर एंड फ़िल्म इलाहाबाद विश्वविद्यालय की नाट्य प्रस्तुति ‘त्रिशंकु ’ का मंचन सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में डॉक्टर विधु खरे दास के निर्देशन में किया गया। यह नाटक दो पीढियों के संघर्ष के मनोविज्ञान को प्रस्तुत करता है। मन्नू भंण्डारी द्वारा लिखित कहानी त्रिशंकु पर आधारित नाटक का प्रर्दशन काफी प्रभावशाली रहा। नाटक की शुरुआत होती है तनु की कहानियों से जो अपने के बारे में बात करती है वह बताती है कि किस तरह उसकी मम्मी अपने पिता से विद्रोह करके प्रेम करती है और लोगों से बडे़ गर्व से अपने विवाह के बारे में बताती हैं। वही दूसरी ओर जब तनु और शेखर के बीच प्रेम पनपता है तो तनु की मम्मी को ये उचित नहीं लगता है। इस स्वीकार, अस्वीकार के बीच तनु की मम्मी की स्थिति त्रिशंकु जैसी हो जाती है। वह न तो पूर्ण रूप से नाना बन पाती है न मम्मी । पूरे नाटक में पितृसत्तामक सोच हावी रहता है। त्रिशंकु नाटक की प्रस्तुति दर्शकों को अंदर तक झकझोर देती है। आडोटोरियम में बैठे दर्शक आधुनिकता और रूढिवादिता के बीच फंसे द्नद को देखकर भावविभोर हो जाते है। सोनी ने अपने अभिनय से दर्शकों से खूब वाहवाही लूटी । इसके अलावा पुनीत वर्मा, ऋषभ दास, किरीट सरकार, संदीप, शिवम ने बेहतरीन अभिनय किया। प्रकाश सयोजन घोषाल ने किया। इस अवसर पर केंद्र निदेशक प्रो. सुरेश शर्मा, प्रो. सुरेश भारद्वाज एवं काफी संख्या में गणमान्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन मधुकांक मिश्रा ने किया।
