सन इकसठ हिजरी को कूफा की मस्जिद मे माहे रमज़ान की उन्नीसवीं को फजिर की नमाज़ पढाने के दौरान अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम नामक क़ातिल की ज़हर बुझी तलवार के वार से घायल हुए मौलाए कायनात हज़रत अली इब्ने अबुतालिब ज़ख्मी हालत मे अपने बड़े बेटे हसन ए मुजतबा से नमाज़ अदा कराने के बाद वसीयते की और ग़रीबों मिस्कीन के घरों पर रोटीयां पहुँचाते रहने की ताकीद करने के बाद माहे रमज़ान की इक्कीसवीं को अमीरुलमोमनीन इस दुनिया को अलवेदा कह गए।तब से हर वर्ष दुनिया भर मे मौलाए कायनात हज़रत अली के चाहने वाले तीन दिन ग़म मनाते चले आ रहे है।दो वर्ष की कोरोना बंदिशों के हटने के बाद एक बार फिर मस्जिदों गमामबाड़ों व इबादतगाहो मे अक़ीदतमन्द जुटे ।मसजिद क़ाज़ी साहब बख्शी बाज़ार मे माहे रमज़ान की इक्कीसवीं की सुबहा ग़म की चादर ओढ़े सिसकियाँ लेते शुरु हुई।मस्जिद मे मौलाना जवादुल हैदर रिज़वी की क़यादत मे नमाज़ अदा कराने के बाद मस्जिद व आस पास सड़को पर जल रही लाइटों को शोक मनाने को बन्द कर दिया गया।मौलाना सैय्यद रज़ी हैदर ने शहादत मौला अली का तज़केरा जैसे ही शुरु किया हर तरफ से आहो बुका की सदा गूँजने लगी।मोमबत्ती की रौशनी मे इस वर्ष इरानी शैली का नक़्क़ाशीदार गहवारे मे रखा काली मलमल की चादर से ढ़का ताबूत लोगों की ज़ियारत को निकाला गया।मातमदारों ने या अली मौला हैदर मौला की सदा बुलन्द करते हुए मस्जिद के अन्दूरुनी हिस्से से लेकर हाथा खुर्शैद हुसैन मरहूम तक ज़ोरदार सीनाज़नी कर अक़ीदत का इज़हार किया।बड़ी संख्या मे मातमदार व रोज़ादार जुलूस मे शिरकत किए
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