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हमारा स्वास्थ्य हमारी ज़िम्मेदारी” – प्रो.(डॉ) जी एस तोमर

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आरोग्य भारती, विश्व आयुर्वेद मिशन एवं महावीर ग्रुप ऑफ इन्स्टीट्यूसन्स , प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में दि. 28 अप्रैल को आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में “स्वास्थ्य प्रबोधन एवं पर्यावरण संरक्षण” विषय पर एक कार्यशाला प्रायोजित की गई । जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में आरोग्य भारती के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य एवं राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ, आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सम्मानित गुरु आयुर्वेद के प्रख्यात विद्वान एवं सिद्धहस्त चिकित्सक प्रो. (डॉ) जी एस तोमर रहे । विशिष्ट अतिथि के रूप में काशी प्रांत के संगठन सचिव डॉ अजय मिश्रा एवं सह सचिव डॉ अवनीश पाण्डेय की भी सहभागिता रही । कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ अवनीश पाण्डेय ने भगवान धन्वन्तरि के पूजन व स्तवन के साथ किया । इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में संस्थान परिसर में वृक्षारोपण भी किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता महावीर ग्रुप ऑफ इन्स्टीट्यूसन्स के बीएड संस्था के प्रधानाचार्य डॉ तारा शंकर सिंह ने की । अपने उद्वोधन में डॉ तोमर ने स्पष्ट किया कि आरोग्य भारती का मूल उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ परिवार, स्वस्थ गाँव एवं स्वस्थ राष्ट्र है । इसके लिए गाँव गाँव, गली गली में जन जागरूकता फैलानी होगी । हमें यह बताना होगा कि हमारा स्वास्थ्य हमारी ज़िम्मेदारी है ।यद्यपि शासन के स्तर से इस दिशा में अनेक लोकप्रिय योजनाएँ प्रचलित हैं । तथापि हमें स्वयं अपने आचार – विचार एवं आहार – विहार को संतुलित करना होगा । आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है । यह मात्र एक चिकित्सा विधा ही न होकर सम्पूर्ण जीवन दर्शन है । इसमें आहार-निद्रा-ब्रह्मचर्य को तीन उपस्तम्भों के रूप में बताया गया है । इनमें सबसे महत्वपूर्ण आहार है । हमें क्या, कब, कैसे और कहाँ आहार ग्रहण करना चाहिए । इसका विस्तृत वैज्ञानिक उपदेश आयुर्वेद में किया गया है । वेदों में भी “हितभुक, मितभुक, अशाकभुक एवं ऋतभुक कहकर आहार सम्बन्धी नियमों का अत्यन्त वैज्ञानिक विश्लेषण किया है । आयुर्वेद में प्रत्येक संवत्सर में उत्तरायण एवं दक्षिणायन दो अयन, दो – दो माह की छह ऋतुएँ होती हैं । चैत्र-वैशाख में बसंत ऋतु होती है । अत: वर्तमान में बसंत ऋतु के इस काल में कफ स्वाभाविक रूप से प्रकुपित होता है । इसमें कफ बढ़ाने वाले खान पान से बचना चाहिए । कठिनाई से पचने वाले आहार जैसे कोहड़ा, कटहल, बैंगन, उड़द की दाल आदि के सेवन से बचें । फ्रिज में रखे ठंडे खान पान न लें । अधिक चिकनाई वाले भोज्य पदार्थ जैसे पूड़ी , पराठा आदि का सेवन यथासंभव न करें । मिष्ठान्न सेवन पर भी संयम रखें ।मौसमी स्थानीय फल जैसे- संतरा, पपीता, अंगूर, लीची, तरबूज़ एवं ख़रबूज़ा आदि एवं मौसमी सब्ज़ियाँ जैसे – निनुआ, लौकी, करेला, परवल, खीरा, ककड़ी आदि का भरपूर प्रयोग करें । शीतगृह में रखे फल व सब्ज़ियों के प्रयोग से बचें । यथासंभव ताज़ा एवं सुपाच्य भोजन ही ग्रहण करें । 6-8 घंटे की आवश्यक नींद लें । ग्रीष्म ऋतु में दिन में सोना भी हानिकारक नहीं होता । संयमित जीवनशैली रखें ।
कोरोना कालखण्ड में समस्त चिकित्साविदों ने एक मत से यह प्रमाणित किया है कि इस प्रकार के गम्भीर संक्रामक रोगों से बचने के लिए हमारी इम्युनिटी ही सशक्त साधन है । अत: हमें इस प्रकार के खान पान एवं जीवनशैली का प्रयोग करना चाहिए जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अर्थात् इम्युनिटी बढ़ सके । यह कार्य कुछ दिनों एवं महीनों का नहीं है । हमें नियमित रूप से प्रतिदिन आयुर्वेद में वर्णित गिलोय, असगंध, तुलसी, हल्दी, मुलहठी, दालचीनी एवं सोंठ आदि एकल द्रव्य एवं गिलोयघनवटी, च्यवनप्राश, अगस्त्य हरीतकी जैसी प्रामाणिक रोग प्रतिरोधक क्षमता वर्धक औषधियाँ चिकित्सक के परामर्श से प्रकृति के अनुसार अवश्य लेना चाहिए । आयुर्वेद चिकित्सा व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार प्रयोज्य है । इसके अलावा हमें अपने बिगड़ते हुए परिवेश को भी सुधारना होगा । मानव शरीर ब्रह्माण्ड का ही सूक्ष्म प्रतिरूप है । अत: पर्यावरण में हुए न्यूनतम से न्यूनतम बदलाव का सीधा प्रभाव हमारे शरीर पर होता है । भौतिकता की दौड़ में दौड़ता हुआ आज का मानव प्राकृतिक संसाधनों को निरन्तर हानि पहुँचा रहा है । हरे भरे जंगलों की कटाई करके कंक्रीट के जाल फैलाकर अपनी मिथ्या समृद्धि प्रकट करने में लगा हुआ आज का मानव विकास की ओर नहीं विनाश की तरफ़ अग्रसर है । पृथ्वी के हरित आवरण के घटने से ग्लोबल वार्मिंग का ख़तरा निरन्तर बढ़ रहा है । जल के दुरुपयोग ने प्राकृतिक जलस्तर को ख़तरे की सीमा तक घटा दिया है । विकास की कहानी कहती हुईं तथाकथित चिमनियाँ, धुआँ उगलते ऑटोमोबाइल्स तथा समृद्धि का पर्याय बने कंक्रीट के जंगलों ने हमारे अमृत तुल्य नैसर्गिक पर्यावरण को विषाक्त कर दिया है । प्लास्टिक हमारे जीवन का अभिन्न अंग बनकर अंदर ही अंदर हमारे शरीर को दीमक की तरह चाट रही है । जिससे हम चाहकर भी अपना पिण्ड नहीं छुड़ा पा रहे हैं ।
आज के इस भयावह परिदृश्य में हमें समय रहते चेतना होगा तभी हम विनाश की ओर तेज़ी से दौड़ रही मानव सभ्यता की सुरक्षा कर सकेंगे ।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखते हुए विश्व आयुर्वेद मिशन के प्रान्तीय महासचिव डॉ अवनीश पाण्डेय, प्रभारी चिकित्साधिकारी, रामापुर, प्रतापगढ़ ने गृहवाटिका में लगाए जाने वाले असगंध, गिलोय, सतावर, सर्पगंधा, घृतकुमारी, सदाबहार, मधुरान्तक एवं कालमेघ आदि मेडिसिनल प्लांट्स की चिकित्सीय उपयोगिता की विस्तृत जानकारी साझा की । इन पौधों के घर घर में रोपण करने से रोज़मर्रा की बीमारियों का घरेलू इलाज आसानी से किया जा सकता है ।
उन्होंने बताया कि वनों की अंधाधुंध कटाई से प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है।
जंगल जल जीव जमीन का संतुलन बनाकर रखना आवश्यक है।
हमे 3R रिड्यूस रीसायकल एवं रीयूज को अपने जीवन मे अपनाकर पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना होगा।प्लास्टिक के प्रयोग को बंद कर कागज एवं पत्तल के बने पत्तों एवं कुल्हड़ के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा।
बीमारी से बचने के लिए हमे रायायनिक खाद के स्थान पर जैविक खाद के प्रयोग की बात कही।
उन्होंने राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ अशोक वार्ष्णेय जी द्वारा बताई एक घटना के विषय मे बताया।झारखंड के वनवासी क्षेत्र के एक वर्ग द्वारा वनों की कटाई करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वनों का दोहन न हो, जमीन से कुछ ऊंचाई पर तिरछा काटकर गोबर का लेप करने से नए कोपल निकल आते हैं।हम भी कुछ ऐसा प्रयोग करें जिससे हमारे जंगल पूर्णतः नष्ट न होने पाएं।उन्होंने छात्रों से अपने जन्मदिन पर एक पौधा लगाने एवं उसकी देखभाल करने का सुझाव दिया।

अपने उद्वोधन में आरोग्य भारती काशी प्रांत संगठन सचिव डॉ अजय मिश्रा ने आरोग्य भारती के उद्देश्यों एवं विभिन्न आयामो के विषय मे जानकारी देते हुए आयुर्वेदीय जीवनशैली को अत्यन्त सरल एवं व्यावहारिक भाषा में समझाया । डॉ मिश्रा ने आह्वान किया हमें अपने जीवन को अनुशासित बनाना होगा तभी हम स्वस्थ रह सकेंगे । स्वस्थ रहकर ही हम आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न भी साकार कर सकेंगे ।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ तारा शंकर सिंह ने आयुर्वेद को अत्यन्त प्रभावी विधा बताते हुए इसे अपनी अमूल्य धरोहर बताया । डॉ सिंह ने आज के इस सफल कार्यक्रम के लिए आरोग्य भारती का बहुत बहुत आभार जताया । कार्यशाला में बी एड के छात्र श्री शुभ त्रिपाठी, श्री अजय मौर्य एवं सुश्री आस्था राय ने भी पर्यावरण संरक्षण पर अपने विचार साझा किए । कार्यक्रम का सफलतापूर्वक संचालन संस्थान के प्रशासनिक अधिकारी श्री अजय सिंह ने किया । संस्थान की ओर से सभी सम्मानित अतिथियों को अंगवस्त्रम् उढ़ाकर स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया । इस ज्ञान यज्ञ में लगभग 300 महाविद्यालय परिवार के विद्वान प्राध्यापक एवं छात्र- छात्राओं ने प्रतिभाग किया । कार्यक्रम के अंत में डॉ अवनीश पाण्डेय ने शांति मंत्र के साथ कार्यशाला का समापन किया ।

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