हिन्दी साहित्य सम्मेलन का इतिहास और हुआ समृद्ध

प्रयागराज
किसी साहित्यिक संस्थान की प्रगति और समृद्धि का आधार उसकी पत्रिका और उसके द्वारा प्रकाशित पुस्तकें आदि होती हैं। इस दृष्टि से हिन्दी साहित्य सम्मेलन का इतिहास बड़ा ही समृद्ध रहा है। यहाँ से प्रकाशित पत्रिकाएँ (सम्मेलन पत्रिका, राष्ट्रभाषा संदेश, माध्यम) हिन्दी साहित्य जगत की मानक और विचारोत्तेजक पत्रिकाएं सिद्ध हुईं। साहित्य के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली पत्रिका ‘माध्यम’ संयोगवश एक अरसे से बंद थी। अगर इसके इतिहास पर दृष्टिपात करें तो देखते हैं कि हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि बालकृष्ण राव के सम्पादन में १९६४ में सम्मेलन के तत्कालीन प्रधानमन्त्री प्रभात मिश्र जी के सहयोग से इसका साहित्यिक प्रवेश हुआ। इसके बाद १९६९ तक उन्होंने बखूबी इसके सम्पादन का कार्य किया। कतिपय कारणों से १९६९ में इसका प्रकाशन बंद हो गया, किन्तु २००१ में सत्यप्रकाश मिश्र जी ने सम्मेलन के प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र के सहयोग से इसका पुनर्प्रकाशन प्रारम्भ किया। सन २००७ में सत्यप्रकाश के दुर्भाग्यपूर्ण निधन के बाद उनकी स्मृति में प्रकाशित अंक के बाद इसका प्रकाशन पुनः बन्द हो गया। अब २०२५ में इसके पुनर्प्रकाशन की तरफ सम्मेलन के वर्तमान प्रधानमंत्री कुन्तक मिश्र का ध्यान गया। इसके वर्तमान सम्पादन का दायित्व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर राजेश कुमार गर्ग पर है। उनके कुशल सम्पादकत्व में इसका सन २०२५ का नवीनतम अंक आया है जो “इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता” पर केन्द्रित है । सम्मेलन के प्रधानमन्त्री कुन्तक मिश्र ने बताया कि जल्द ही पत्रिका का सन २०२६ का अगला अंक भी प्रकाशित किया जायेगा जो “हिन्दी साहित्य में भारत बोध” पर केन्द्रित होगा।
ध्यातव्य है कि इस पत्रिका के पहले प्रकाशन की यात्रा नेमिचन्द्र जैन, अमृत राय, रामस्वरूप चतुर्वेदी, विद्यानिवास मिश्र, रघुवंश, केशवचन्द्र वर्मा, पंत, जगदीश गुप्त, बच्चन, प्रयागनारायण त्रिपाठी आदि साहित्यिक विभूतियों के साथ प्रारम्भ की गई थी, जिसमें कालांतर में बनारसीदास चतुर्वेदी, राय कृष्णदास, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, देवीशंकर अवस्थी, मन्मथनाथ गुप्त, शिवानी, रमेशकुंतल मेघ, प्रभाकर माचवे, बच्चन सिंह, रामधारी सिंह दिनकर, अशोक वाजपेयी, भारतभूषण अग्रवाल, रामदरश मिश्र, मलयज, विजयदेव नारायण साही, शिवप्रसाद सिंह आदि महत्वपूर्ण विभूतियों ने अपनी रचनाओं द्वारा इसे समृद्ध किया।
