सनातन परंपरा के 16 संस्कारों में पहला संस्कार है गर्भाधान संस्कार

लेख-डॉ दीप्ति योगेश्वर
(योगाचार्या व भौतिक चिकित्सक)
गर्भधारण– ईश्वर ने स्त्री को वरदान स्वरूप एक प्रक्रिया दी है जिससे लगभग प्रत्येक महिला होकर गुजरती है। गर्भधारण परिवार में नए सदस्य के आने का संकेत व समाज में तालमेल बढ़ाने की ओर एक कदम है एवं वंश बढ़ाने की एक परंपरा है। गर्भधारण सनातन के 16 संस्कारों में से प्रथम संस्कार गर्भ संस्कार है, जो मानव जाति मे सामान्यता 9 महीने का गर्भ काल माना गया है । जिसमें एक स्वस्थ माता स्वस्थ शिशु को जन्म देती है इसी प्रकरण में यदि गर्भ से जुड़े कुछ प्रक्रियाओं की बात करें तो उसमें सबसे मुख्य प्रक्रिया है आखरी गर्भकाल प्रक्रिया अर्थात प्रसव क्रिया। पुराने जमाने में प्रसव घरों में आया, दाई जो कि प्रसव विशेषज्ञ हुआ करती थी उनसे कराया जाता था। जिसमें पूर्व समय में भी हाइजीन का विशेष ध्यान दिया जाता था। समय बदलने के साथ चिकित्सा पद्धति में विकास हुआ और प्रसूति विशेषज्ञ से प्रसव कराने का चलन शहरों से लेकर धीरे-धीरे गांव तक पहुंच गया । कहते हैं प्रसव काल यानी लेबर पेन 1 से 20 घंटे तक चलने वाला ऐसा असहनीय दर्द है जो कि सामान्य चोट में 45 डील दर्द की इकाई से बढ़कर 57 डील दर्द की मापन इकाई में बदल जाती है। यू कहा जाता है कि प्रसव पीड़ा मानव शरीर के 20 हड्डियों के टूटने के दर्द जितना बराबर होता है। पुराने समय में प्रसव सामान्य होता था जिसे नॉर्मल डिलीवरी कहा जाता है । आधुनिक समय में जीवन शैली में परिवर्तन की वजह से यह नॉर्मल डिलीवरी सिजेरियन डिलीवरी में बदल गई है। ऐसा होने की तमाम वजह है जिसमें से मुख्य वजह लाइफ़स्टाइल चेंजेज या आधुनिक जीवन शैली में बदलाव है। जिसमें मुख्य रूप से उचित खानपान की कमी ,सही दिशा निर्देश की कमी, गर्भकाल जानकारी की कमी व आज की महिलाओं में दर्द सहन करने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाना यह एक मुख्य वजह बनी है सिजेरियन डिलीवरी की ।।कहते हैं धरती पर सब कुछ चक्रीय प्रक्रिया है अर्थात साइक्लिक प्रोसेस है उसी के अंतर्गत पहले नॉर्मल डिलीवरी फिर सिजेरियन अब पुनः सारी पद्धति विज्ञान नॉर्मल डिलीवरी की ओर बढ़ रहा है जिसमें मुख्य रुप से ध्यान देने योग्य बातें निम्न है–
पहला गर्भकाल में उचित खानपान उचित सेवा महिला के प्रति सामान्य खुशनुमा माहौल वह गर्भवती महिला को खुश रखना है ।
दूसरा पूरे गर्भ काल के समय महिला को कुछ खास प्रकार के व्यायाम करवाना जिसको प्रीनेटल एक्सरसाइज भी कहते हैं । जिसे तीन तीन महीने के तीन सेट में बांटा गया है हर 3 महीने पर गर्भ की स्थिति बदलने की वजह से व्यायाम भी बदल जाते हैं।
आज आधुनिक समय में जल प्रसव का अत्यधिक प्रचलन है उपरोक्त विधियों के साथ सावधानी एवं विशेषज्ञ की सलाह एवं निर्देशन के अंदर ही इन प्रक्रियाओं को करना चाहिए जैसे प्रीनेटल एक्सरसाइज किसी योग विशेषज्ञ या प्रीनेटल ट्रेनर से ही करवाना चाहिए साथ ही प्रसूति विशेषज्ञ से भी नियमित सलाह लेनी चाहिए । जल प्रसव प्रसूति विशेषज्ञ के सकुशल निर्देशन में ही होना चाहिए। व्यायाम के फायदे निम्न है
संपूर्ण गर्भकाल के अलग-अलग विधियों के व्यायाम से प्रसूता को लाभ मिलता है जिसमे दर्द से आराम ,शरीर की सही स्थिति व प्रसव काल में उपयोग होने वाले मांस पेशियों की मजबूती एवं गर्भाशय की उचित रक्त संचरण में लाभ मिलता है । आधुनिक जल प्रसव में महिला को प्रसूति विशेषज्ञ व अन्य विशेषज्ञ के निर्देशन में गर्म जल संचय अर्थात लुक वार्म वॉटर पूल या टब में बिठाकर प्रसव का प्रावधान है । जिससे हल्के गर्म जल से गर्भाशय की बाहरी मांसपेशियां तनाव मुक्त होती है, मांसपेशियों के गर्म होने से उन्हें उचित रक्त संचार मिलता है साथ ही गर्भाशय की मांसपेशियों में संकुचन और प्रसारण अच्छा होता है जो प्रसूति में लाभदायक है जिससे महिला को गुरुत्वाकर्षण की दिशा मे लगाए जाने वाले बल में कमी आती है। साथ ही 1 से 20 घंटे के दर्द की अवधि को कम किया जा सकता है । इसके साथ ही संपूर्ण गर्भकाल में शिशु 1 तरह के तरल पदार्थ में के आवरण में रहता है जिसे एमनियोटिक फ्लूड या द्रव कहा जाता है । ऐसा माना जाता है की शिशु एमनियोटिक फ्लूट के फटने से सीधे हवा के संपर्क में आए बिना जल के संपर्क में आता है जिससे उसे धरती पर सांस लेना आसान होता है किंतु इसमें कुछ सावधानियां जो सही समय पर शिशु को जल से बाहर निकालना किसी भी प्रकार के इंफेक्शन मल मूत्र का शिशु के शरीर में प्रवेश या संक्रमण से बचाना आदि का ध्यान रखना पड़ता है। साथ ही जल मे प्रसव प्रसूता के उच्च रक्तचाप को नियंत्रित कर उसे तनाव मुक्त करता है
व संपूर्ण शरीर को आराम देता है। जल में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया अर्थात अधिक से अधिक ऑक्सीजन शिशु को मिलता है जो कि बहुत ही लाभकारी है एवं कुछ खास हॉर्मोनेस जैसे एंडोरफिन का सेक्रिशन होता है।।
