लेख संजय पाण्डेय
लेख संजय पाण्डेय
*इस समय संसदीय लोकतंत्र शायद अपने सबसे निचले मकाम पर पहुंच गया है।यह ढलान कब समाप्त होगी, समतल जमीन कब मिलेगी ,कोई नहीं जानता,किसी को पता नहीं**
जिम्मेदार कोई भी हो , संसद परिसर में पिछले कुछ दिन पहले जो हुआ वह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के चेहरे पर एक बड़े धब्बे के समान है । घटना पर चर्चा नहीं करेंगे , सब जान गए हैं कि क्या क्या हुआ । कौन दोषी और कौन अहंकारी यह किसी से छिपा हुआ नहीं है ।
दस वर्षों से संसद का ऐसा कोई सत्र नहीं हुआ जब सब कुछ 50 प्रतिशत शांति के साथ संपन्न हो गया हो । 100 प्रतिशत शांत सदन तो अब असंभव हो गए हैं । संसद सत्र दूसरे को नीचा दिखाने , जिस जनता ने वोट देकर सरकार बनाई उसे काम न करने देने के लिए बदनाम हो चुके हैं । लगता है संसदीय राजनीति ख़ीज मिटाने का एक मंच बन चुकी है ।
सबसे बड़ी खीज चुनावी पराजय से उत्पन्न होती है । अब देखिए 2012 से ...









